-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
इस फिल्म (Vibe) को एक्शन-थ्रिलर-कॉमेडी कह कर बेचा जा रहा है तो सबसे पहले एक थ्रिलर वाला देखिए-भारत की एक खुफिया एजेंसी अगले हफ्ते थाईलैंड जा रहे दो साधारण लड़कों को एक मिशन सौंपती है। एजेंसी की हैड कहती है-‘हम कोशिश करेंगे कि हमारी दो साल की ट्रेनिंग तुम्हें एक हफ्ते में करा सकें।’ इस बचकानी बात के बाद बाकायदा कोशिश की भी जाती है और इस कोशिश में उन दोनों मरगिल्ले लड़कों को जिम में कसरतें करवाई जाती हैं गोया कि विलेन थाईलैंड में इनसे बाल्टियां भरवाएगा। सोचिए कि इतनी मरगिल्ली प्लानिंग लेकर जा रहे लड़कों के इस मिशन में कैसा थ्रिल होगा?
अब कॉमेडी वाला सीन देखिए-हवाई जहाज में बैठे इन लड़कों में से एक अचार के साथ थेपले खा रहा है। दूसरा लड़का कहता है-‘यह ठीक है, वे गोलियां मारेंगे, तू पाद मारियो।’ सोचिए कि इतनी सड़ी हुई कॉमेडी देख कर आपको कितनी हंसी आएगी?
अब एक्शन वाला सीन भी देख लेते हैं। इन लड़कों में से एक को विलेन हवाई जहाज में लेकर उड़ने वाला है। दूसरा लड़का रनवे पर सामने से आकर चलते जहाज की तरफ मोटर साइकिल दौड़ा रहा है। अबे, करना क्या चाहता है? जहाज को टक्कर मारेगा क्या? यह सवाल उससे फिल्म में भी पूछा जाता है और वह कोई जवाब नहीं दे पाता। वैसे भी एक्शन के नाम पर इस फिल्म के दोनों हीरो गुंडों से पिटते ही रहे हैं। आप चाहें तो इन पर लानत भेज सकते हैं।
दरअसल यह फिल्म (Vibe) आपके किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं देती। यहां तक कि यह खुल कर यह भी नहीं बता पाती कि विलेन इन लड़कों से आखिर कौन-सी ऐसी खास तकनीक हासिल करना चाहता है और उस तकनीक से विलेन करेगा क्या?
कुणाल खेमू भागती-दौड़ती कहानियों वाली फिल्मों में अपनी कॉमिक एक्टिंग की टाइमिंग से लुभाते आए हैं। बतौर लेखक-निर्देशक अपनी पहली फिल्म ‘मडगांव एक्सप्रैस’ में भी उन्होंने यह वाली भगदड़ मचाई थी। अब उनकी यह फिल्म ‘वाइब’ भी वैसी ही भगदड़ लेकर आई है जिसमें दो शरीफ लड़कों के एक तरफ इंटरनेशनल आतंकवादी हैं तो दूसरी तरफ खुफिया एजेंसी वाले। लेकिन इस बार कुणाल न सिर्फ कहानी बुनने के मामले में बुरी तरह से चूके हैं बल्कि उसे स्क्रिप्ट के तौर पर फैलाते हुए तो उनकी कलम फट का फव्वारा हो गई है। यह सही है कि इस किस्म की कॉमिक-कैपर फिल्मों में लॉजिक का पहाड़ा नहीं पढ़ा जाता लेकिन इस किस्म की कहानियों में तेज़ रफ्तार और लगातार घटती घटनाओं का होना भी ज़रूरी होता है ताकि दर्शक को न तो सोचने का समय मिले और न ही दिमाग भिड़ाने का। ‘मडगांव एक्सप्रैस’ में कुणाल यह फॉर्मूला अपना कर कुछ हद तक कामयाबी और तारीफें बटोर ले गए थे लेकिन इस बार उनकी काठ की हांडी में छेद हो चुका है जिसमें से मनोरंजन का रस रह-रह कर लीक हो रहा है।
(रिव्यू-रुकती, थमती, आगे बढ़ती ‘मडगांव एक्सप्रैस’)
कहने को इस फिल्म (Vibe) में थ्रिल है, एक्शन है, कॉमेडी भी है लेकिन एक तो यह सब बहुत ही बनावटी है, जबरन ठूंसा गया लगता है और दूजे इनकी खुराक न तो बहुत ज़्यादा है और न ही लगातार है। थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ-कुछ होता है और फिर बहुत देर तक कुछ नहीं होता है। और होने के नाम पर होता भी क्या है-कुछ घिसे हुए पंचेज़, कुछ वल्गर बातें, कुछ द्विअर्थी संवाद और कुछ मूर्खतापूर्ण संवाद व हरकतें। दिक्कत यह है कि फिल्म वालों ने यही सब परोस-परोस कर हमारा स्वाद बिगाड़ दिया है और अब हम लोग इसी को मनोरंजन मान कर निगले भी जा रहे हैं।
किरदारों की बुनावट गड़बड़ है और उनकी बैक-स्टोरीज़ भी कच्ची रह गई हैं। इस किस्म की लिखाई को पटकथा-लेखन की भाषा में अपनी सुविधा के लिए गढ़ी गई स्क्रिप्ट (Script of convenience) कहा जाता है। किरदारों के नाम भी क्या सोच कर रखे गए? एजेंसी की हैड का नाम मैडम एच क्यों है? भागीरथ नाम आजकल के किस युवा का मिलेगा? हीरो का नाम हार्दिक रख दो ताकि कोई अंग्रेज़ उसे हार्ड-डिक बोले और दर्शक हंसें। और इन किरदारों को निभाने के लिए कलाकार किस आधार पर चुने गए? ‘लापता लेडीज़’ के दीपक यानी स्पर्श श्रीवास्तव का काम हालांकि अच्छा रहा लेकिन वह कुछ ज़्यादा ही क्यूट लगे। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और यशपाल शर्मा बिल्कुल भी नहीं जंचे। इन्हें लिया था तो कोई कायदे का रोल तो देना था। एक सीन में आईं उर्फी जावेद वही कर गईं जो वह हमेशा करती हैं-इरिटेट। प्रीति ज़िंटा पता नहीं क्यों, बुझी-बुझी सी लगीं। कुणाल खेमू तो खैर, कब से खुद को दोहरा ही रहे हैं। नई कन्या वंशिका धीर में के चेहरे पर प्लास्टिक ज़्यादा दिखा, भाव कम।
कुणाल खेमू का निर्देशन साधारण रहा। उन्हें चमकीले रैपर की बजाय अपने कंटैंट की क्वालिटी और क्राफ्ट के पैनेपन पर ध्यान देना चाहिए। और यह ‘वाइब’ नाम क्या सोच कर रखा उन्होंने? आधे दर्शकों को तो यह समझ नहीं आएगा और जिन्हें समझ आएगा, वे पूछेंगे कि नाम तो रख दिया, कुछ वाइब्स भी डाल ही देते फिल्म में। फिलहाल तो यह (Vibe) एक ऐसी रूखी और सूखी फिल्म है जो कहीं-कहीं, कुछ-कुछ हंसाती तो है लेकिन ज़्यादा देर पकाती है-अपने माल की हल्की क्वालिटी से और उसकी बेवजह की लंबाई से भी।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि यह कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस पोस्ट के नीचे कमेंट कर के इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
Release Date-18 September, 2026 in theaters
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ–साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब–पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
