-दीपक दुआ… (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
जापान के फुजी पर्वत को नखरे वाला पर्वत माना जाता है। कभी यह मीलों दूर से भी दिख जाता है तो कभी पास से भी नज़र नहीं आता है। ज़्यादातर तो यह बादलों में ही छिपा रहता है और कभी अचानक से मन मोहने वाली अदाएं बिखेरने लगता है। हालांकि यह सवा तीन सौ साल पहले आखिरी बार फटा था लेकिन आज भी इसे एक जीवित ज्वालामुखी माना जाता है। इस फिल्म में फुजी का क्या किरदार है, यह आगे समझेंगे लेकिन पहले यह जान लीजिए कि सोनीलिव पर आई यह एक मराठी फिल्म है जिसका मूल नाम ‘तो ती आणि फुजी’ (Toh Ti Ani Fuji) (मैं वो और फुजी Main Woh Aur Fuji) है और यह मराठी के साथ-साथ हिन्दी में भी देखी जा सकती है।
नायिका जापान में रहती है। एक दिन उसे वहां नायक दिखता है। दोनों एक-दूसरे को देख कर हैरान होते हैं, खुश होते हैं और सात साल पहले के उन दिनों को याद करने लगते हैं जब वे दोनों पुणे में एक साथ थे, लिव-इन में रहते थे, शादी करने वाले थे कि एक दिन…!
मोहित टाकलकर की कहानी पर इरावती कार्णिक की लिखी पटकथा आज की युवा पीढ़ी को बड़े करीब से दिखाती है। ये लोग खुद को बहुत ‘कूल’ समझते हैं, घर-परिवार से दूर अकेले रहने को ‘आज़ादी’ मानते हैं, बिना शादी के साथ रहना इनका शगल है, पल में किसी को अपनाना, क्षण में दुत्कार देना इन्हें आसान लगता है, गम हो या खुशी, सिगरेट-शराब ही इनका सहारा होता है। फिल्म दिखाती है कि इस पीढ़ी को रिश्ते बनाना और तोड़ना तो आता है, रिश्ते निभाने में ये लोग डगमगा जाते हैं। लेकिन हर किसी की ज़िंदगी में एक वक्त आता है जब इन्हें अपनी गलतियां समझ आती हैं, जब ये खुद को सही रास्ते पर लाने की कोशिशें करने लगते हैं। ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) इसी बात को अंडरलाइन करती है।
इस फिल्म ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) की लिखाई बहुत सधी हुई है। अन्य रोमांटिक फिल्मों से अलग यह कहानी न तो प्यार की खुशबुएं बिखेर रही है और न ही उसका टॉक्सिक चेहरा दिखा रही है बल्कि यह कहानी नई पीढ़ी के उस यथार्थ में झांकती है जहां ये लोग रिश्ते बनाते-बनाते अचानक से उसे तोड़ने पर आमादा हो उठते हैं। मोहित की कहानी में परिपक्वता है तो इरावती ने उसे सलीके से फैलाते हुए कायदे के संवादों से संवारा है।
मोहित टाकलकर का निर्देशन बहुत सधा हुआ है। अपने बनाए दृश्यों से उन्होंने दर्शकों को किरदारों के भीतर झांकने का मौका दिया है। युवा पीढ़ी की जीवन शैली का खुलापन दिखाते हुए मोहित यह दिखा पाने में सफल रहे हैं कि ‘माई बॉडी, माई लाइफ’ का नारा बुलंद करने वाले ये युवा जिस लाइफ स्टाइल को ‘कूल’ मान चुके हैं दरअसल वही इन्हें अकेला और कमज़ोर बना रहा है। फिल्म कहीं-कहीं सुस्त पड़ती है तो कहीं दार्शनिक हो उठती है। असल में यह फिल्म ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) तेज़ रफ्तार पीढ़ी के बारे में ज़रूर है मगर अपनी ठहरी हुई रफ्तार से यह उन्हें यही अहसास दिला रही है कि जीवन में रफ्तार नहीं ठहराव से सुकून मिलता है।
फिल्म ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) की सिनेमैटोग्राफी सचमुच बहुत जानदार है। इनडोर हो या आउटडोर, क्लोज़अप हों या भीड़ के शॉट्स, भारत हो या जापान, कैमरे ने जिस बारीकी से हर किसी को कैद किया है, वह प्रशंसनीय है। रंगों और रोशनी का भी प्रभावशाली इस्तेमाल दृश्यों में दिखाई देता है। बैकग्राउंड म्यूज़िक ने भी दृश्यों को असरदार बनाने का काम किया है। गीत व धुनें मोहक हैं। ‘ज़रा सा चूमूं आसमां जो पल मिलें, तेरा ख्याल ओढ़ कर मेरे बदन को रंग मिलें…’ के बोल निहायत ही खूबसूरत हैं।
ललित प्रभाकर ने एक खिलंदड़े युवक से एक मैच्योर इंसान बनने के अपने किरदार के अलग-अलग शेड्स को कायदे से दिखाया है। मृण्मयी गोडबोले का काम बेहद प्रभावी रहा है। एक लड़की जो अपनी राह खुद बना रही है, अपना रास्ता खुद तय कर रही है। किसी रिश्ते में पड़ने से लेकर उससे निकलने और खुद को संभाले रखने का यह किरदार निभाना आसान नहीं रहा होगा मृण्मयी के लिए। बाकी कलाकारों का काम भी असरदार रहा है।
रही बात फुजी पर्वत की, तो फिल्म ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) सांकेतिक तौर पर यह बताती है कि एक सुप्त ज्वालामुखी हम सब के भीतर होता है जिसे कब फटना है, यह कभी हम तो कभी हमारे आसपास के हालात तय करते हैं। हम सब फुजी की तरह ‘मूडी’ भी तो हैं। अपनी सहूलियत के मुताबिक कभी मुखर होना तो कभी पलायन कर जाना हमारी फितरत होती है। कह सकते हैं कि इस फिल्म ‘मै वो और फुजी’ में फुजी पर्वत एक किरदार नहीं है लेकिन इसके किरदारों के भीतर एक फुजी पर्वत ज़रूर है। एक सधी हुई, संभली हुई और मैच्योर किस्म की लव-स्टोरी देखनी हो तो यह फिल्म आपके लिए है।
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Release Date-10 April, 2026 on SonyLIV
(फिल्म ‘मैं वो और फुजी’ (Main Woh Aur Fuji) का ट्रेलर हिन्दी में देखने के लिए यहां क्लिक करें)
(दीपक दुआ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के साथ-साथ विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, वेब-पोर्टल, रेडियो, टी.वी. आदि पर सक्रिय दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य भी हैं।)
