Saturday, 19 September 2020

रिव्यू-नेक इरादे के साथ मनोरंजन का वादा पूरा करती ‘अवरोध’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)

पिछले बरस ‘उरी’ के अपने रिव्यू में मैंने लिखा था कि ऐसी फिल्में ज़रूरी हैं ताकि लोगों को सनद रहे कि देश के भीतर बैठ कर नारे बनाना, सुनना और बोलना अलग बात है और सरहद पर जाकर उन नारों पर अमल करना दूसरी। उस फिल्म में 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी में आर्मी कैंप में घुस आए आतंकियों द्वारा 19 जवानों के मारे जाने के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुस कर आतंकियों के अड्डों को तबाह करने की सर्जिकल स्ट्राइक दिखाई गई थी। सोनी लिव पर मौजूद यह वेब-सीरिज़अवरोध- सीज विद् इनउसी सर्जिकल स्ट्राइक के लिए की गई घेरेबंदी को ज़रा और विस्तार से, ज़रा और करीब से, ज़रा और गहराई से, ज़रा और यथार्थपूर्ण तरीके से दिखाती है।

Saturday, 12 September 2020

रिव्यू-खोखला है यह ‘कार्गो’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कल्पना कीजिए कि (मरने के बाद हम कहां जाते हैं, इसकी सिर्फ कल्पना ही हो सकती है) मरने के बाद इंसान अंतरिक्ष में घूम रहे बहुत सारे स्पेस-शिप्स में से किसी एक में जाते हैं। वहां मौजूद एजेंट उनका सामान रखवा कर, उन्हें ठीक करके, उनकी यादें मिटा कर, फिर से उन्हें इस दुनिया में भेज देते हैं। ये मरे हुए इंसान इन एजेंट्स के लिएकार्गोहैं यानी एक पार्सल, जिन्हें अगले ठिकाने तक पहुंचाना इन एजेंट्स का काम है। आप कह सकते हैं कि वाह, क्या अनोखा कॉन्सेप्ट है...! इस पर तो अद्भुत साईंस-फिक्शन बन सकती है। और चूंकि विषय मृत्यु के बाद का है तो इसमें दार्शनिकता भी भरपूर डाली जा सकती है। पर क्यानेटफ्लिक्सपर आई यह फिल्म ऐसा कर पाने में कामयाब रही है?

Friday, 11 September 2020

ओल्ड रिव्यू-‘हीरो’ नहीं ज़ीरो है यह

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)

सच कहूं तोहीरोको देखने के लिए जाने से पहले ही मैं इसे लेकर काफी नाउम्मीद था। मैं ही नहीं बल्कि इसके प्रोमोज़ देखने के बाद काफी सारे लोगों को यह लग रहा था कि यह 1983 में आई सुभाष घई की जैकी श्रॉफ-मीनाक्षी शेषाद्रि वालीहीरोका आधुनिक रीमेक भले ही हो लेकिन इसमें वैसा दम नहीं होगा जो उसहीरोमें था। लेकिन एक समीक्षक के नाते मैंने हमेशा यह माना है कि हर फिल्म एक अलहदा प्रॉडक्ट होती है और उसे उसी की खूबियों-खामियों पर ही तौला जाना चाहिए। इसलिए इसहीरोको देखते समय बार-बार उसहीरोकी याद आने के बावजूद मैं इसे इसी की खामियों (खूबियां मुझे इसमें मिली नहीं) पर तौल रहा हूं।

Sunday, 6 September 2020

किस भुला दिए गए युद्ध की यादें खंगालती है ‘मैमोरीज़ ऑफ ए फॉरगॉटन वॉर’...?

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दूसरे विश्व-युद्ध के बारे में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है। लेकिन कुछ बातें हैं जिनके बारे में कम ही बात हुई। मसलन भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर और नागालैंड में इस युद्ध के चलते हज़ारों जानें गईं। इस मोर्चे पर एक तरफ थीं जापानी फौजें और दूसरी ओर तत्कालीन ब्रिटिश फौज के भारतीय सिपाही। लेकिन इस लड़ाई के चलते जितने फौजी मरे उससे कई गुना ज़्यादा फौजी वहां के जंगलों में मलेरिया और पेचिश के चलते मरे। इस युद्ध से जुड़ी यादों को खंगालती है यह डॉक्यूमैंटरी जिसका नाम हैमैमोरीज़ ऑफ फॉरगॉटन वॉरयानी एक भुला दिए गए युद्ध की यादें।