Thursday, 26 March 2020

वेब-रिव्यू : इंसानी मन के अंधेरों को दिखाती ‘असुर’

-दीपक दुआ...
आज की दिल्ली में एक सीरियल किलर का आतंक है। वह चुन-चुन कर उन लोगों को मार रहा है जो भले हैं, परोपकारी हैं। हर कत्ल का एक ही पैटर्न। सीबीआई के दिग्गज फॉरेंसिक और अपराध-विज्ञान में एक्सपर्ट लोग भी लाचार। क्यों...?
11 बरस पहले बनारस में एक लड़के ने अपने पिता को मार डाला। गजब लड़का। पन्ने पलटते-पलटते किताबें याद कर लेता। ज़बर्दस्त मेधावी लेकिन पिता उसे असुर कहते थे। क्यों...?
क्या वही लड़का ये सारे कत्ल कर रहा है? क्या वह अकेला है या उसकी कोई टीम है? और क्या वह सचमुच कत्ल कर रहा है या फिर धरती से अच्छाई को मिटा रहा है ताकि कोई अवतार आए और वह उससे भिड़े...?

Wednesday, 25 March 2020

वेब-रिव्यू : रोमांच की पूरी खुराक ‘स्पेशल ऑप्स’ में

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
13 दिसंबर, 2001-पांच आतंकवादियों ने भारत की संसद पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसी रॉ के अफसर हिम्मत सिंह की तफ्तीश कहती है कि वहां पर कोई छठा आदमी भी था जो सिर्फ इनका मददगार था बल्कि इनका लीडर भी था। 18 बरस बीत चुके हैं और हिम्मत सिंह आज भी उस शख्स को तलाश रहा है। इस बीच उसने मध्य-पूर्व के कई देशों में अपने एजेंट फिट किए हैं। हिम्मत पर एन्क्वायरी बैठी हुई है कि पिछले कुछ साल में उसने 27 करोड़ रुपए कहां खर्च किए। उधर बहुत जल्द दिल्ली में एक बड़ा हमला होने वाला है। हिम्मत और उसकी टीम सारी घटनाओं के तार जोड़ रही है। क्या कामयाबी मिल पाएगी इन्हें?

Wednesday, 18 March 2020

ओल्ड रिव्यू-उलझनें सुलझाते हैं ‘कपूर एंड सन्स’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
हर फैमिली में प्रॉब्लम होती हैं पर वो खुशनसीब हैं जिनकी कोई फैमिली होती है...
आप कहेंगे कि कपूर एंड सन्सकी समीक्षा में प्रेम रतन धन पायोका डायलॉग क्यो?
दरअसल इस फिल्म की कहानी भी फैमिली प्रॉब्लम्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है जो बताती है कि अपनी ईगो के चलते दूसरों की गलतियों को माफ और अपनी गलतियों को स्वीकार करने में हम लोग अक्सर इतनी देर लगा देते हैं कि हमारा आज कड़वाहट में बीतने लगता है और आने वाला कल पछतावे में।

Sunday, 15 March 2020

रिव्यू-आधी पास-आधी फेल ‘अंग्रेज़ी मीडियम’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पिता-वह मूर्ख प्राणी जो अपने बच्चों की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकता हैकी टैगलाइन के साथ शुरू होने वाली यह फिल्म राजस्थान के उदयपुर की तारिका बंसल की लंदन के एक मशहूर और महंगे कॉलेज में पढ़ने की ख्वाहिश को पूरा करने की उसके पिता चंपक बंसल की कोशिशों और संघर्ष को दिखाती है। अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भी चंपक अपनी बेटी के सपने को पूरा करने में जुटा रहता है। उसे लगता है कि अपनी पत्नी के आगे पढ़ने का सपना पूरा करके उसके जो गुनाह किया है, अपनी बेटी की इच्छा पूरी करके वह उसका प्रायश्चित कर सकेगा।

Saturday, 7 March 2020

रिव्यू-क्यों तारीफों के काबिल है ‘बागी 3’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एकदम डिफरेंट किस्म की फिल्म है यह। एक लड़का है, बचपन से ही बागी किस्म का। यहां तक कि अपने बाप को भी नाम से बुलाता है (हालांकि संस्कारी है, पर पता नहीं यह ऐब उसमें कहां से आया) जहां भी उसके भाई पर कोई मुसीबत आती है, यह उसे बचाने पहुंच जाता है। यहां डिफरेंट बात यह है कि यहां पर मुसीबत में बड़ा भाई घिरता है और बचाने का काम छोटा भाई करता है। कहिए, है एकदम ही अलग किस्म की कहानी...? तालियां...!