Saturday, 15 August 2020

रिव्यू-मनोरंजन की दौलत है इस ‘लूटकेस’ में

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक नेता ने अपने पाले हुए गुंडे के हाथों दूसरे नेता को दस करोड़ रुपए से भरा सूटकेस भेजा। उस सूटकेस में एक फाइल भी थी। रास्ते में दूसरे गैंग ने हमला कर दिया और सूटकेस गया छूट। देर रात की नौकरी से लौटते एक आम आदमी को वह मिला और वह उसे घर ले आया। अब नेता, उसके गुंडे, उसका पाला हुआ पुलिस वाला, दूसरे गैंग्स्टर के गुंडे, सब उस आदमी के पीछे पड़े हैं। और वह आदमी है कि उस पैसे के बारे में अपने बीवी-बच्चों को भी नहीं बता सकता।


कुछ महीने पहले आए इस फिल्म के ट्रेलर से ही इसकी कहानी साफ हो गई थी। मुझे दिलचस्पी थी यह जानने की इस कहानी को कैसे समेटा गया होगा क्योंकि इस किस्म की कहानियों को फैलाना तो आसान होता है लेकिन फैलावट में संतुलन बनाए रखना और अंत में उसे एक कायदे की जगह पर ले जाकर समेटने में बड़े-बड़े लोग फैल कर फेल हो जाते हैं। लेकिन यहां तारीफ करनी होगी इसे लिखने वाले कपिल सावंत और राजेश कृष्णन की, जिन्होंने इस कहानी मेंफिल्मीमसाले डालने के बावजूद इसे एक ऐसे आम आदमी की आम-सी लगने वाली कहानी बनाए रखा जिसकी ज़िंदगी में किस्मत बड़े उतार-चढ़ाव लाती है। फिल्म जाते-जाते सीधी राह पर चलने का संदेश भी दे जाती है, कोई लेना चाहे तो।

हालांकि इसका लेखन कमियों से अछूता नहीं है। कॉमिक-कैपर स्टाइल में बनी होने के चलते इसकी ज़्यादातर कमियों को अनदेखा किया जा सकता है लेकिन कई जगह दृश्यों की सुस्ती अखरने लगती है। यह भी लगता है कि कुछ एक संवाद और चुटीले और कुछ एक सीक्वेंस और नुकीले हो सकते थे। बावजूद इसके यह फिल्म देखते हुए आपके मन में आगे आने वाली घटनाओं के बारे में जानने की उत्सुकता और चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कुराहट का बने रहना बताता है कि निर्देशक राजेश कृष्णन अपने काम में कामयाब रहे हैं। गैंग्स्टर बने विजय राज़ को हमेशा नेशनल ज्योग्राफिक चैनल की भाषा में और नेता बने गजराज राव के घुमा-फिरा कर धमकी देने के स्टाइल में अनूठापन है। इन दोनों ने अपना काम किया भी बखूबी है। काम तो खैर रणवीर शौरी, मनुज शर्मा, आकाश धबाड़े, विजय निकम, निलेश दिवेकर, सुमित निझावन, सचिन नायक, आर्यन प्रजापति जैसे सभी कलाकारों का बढ़िया है। कुणाल खेमू और रसिका दुग्गल की कैमिस्ट्री ज़बर्दस्त रही है। गीत-संगीत साधारण होते हुए भी फिल्म के मिज़ाज में फिट है। लोकेशन वास्तविक लगती हैं। कैमरा वर्क कहीं-कहीं नीरस दिखता है।

एक आम आदमी की ज़िंदगी में अचानक आए एक बड़े बदलाव की इस आम-सी लगने वाली कहानी में इतना मनोरंजन तो है ही कि इसे पूरे परिवार के साथ हंसते-मुस्कुराते, पीते-खाते देखा जा सके। डिज़्नी-हॉटस्टार पर मिल जाएगी यह फिल्म।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि फिल्म कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

2 comments:

  1. मजेदार फिल्म है...सबसे बड़ी बात तो ये है कि गैंगस्टर फिल्म और वोभी ओटीटी फर रीलीज़ होने के बावजूद बहुत साफ सुथरी है

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  2. पढ़कर फ़िल्म देखने जा रहा हूँ

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