Tuesday, 4 August 2020

यात्रा-सांझी छत से हैलीकॉप्टर की सवारी (भाग-5)

-दीपक दुआ...
भैरोंनाथ के मंदिर से दिखता भवन
मां वैष्णों के भवन पर पूरी रात आसमान तले कड़कती ठंड में सोने के बाद सुबह 8 बजे हम लोग भवन से चल दिए। अब हमारा रुख भैरांनाथ के मंदिर की तरफ था। मान्यता अनुसार भैरोंनाथ के मंदिर के दर्शनों के बिना वैष्णो देवी की यात्रा संपूर्ण नहीं मानी जाती और माता के दर्शनों के बाद ही भैरों बाबा के दर्शन किए जाते हैं। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) भैरों घाटी की चढ़ाई कठिन है और इस रास्ते पर खाने-पीने की सुविधाएं भी नहीं हैं। थोड़ा आगे चले ही थे कि एक पिठ्ठू ने पूछा-बिटिया को कंधे पर ले चलूं साहब? बिटिया भी यह सुन कर खुश हुई। दीपाक्षी को अपने कंधों पर बिठा कर उस पिठ्ठू ने हमारा बैग भी ले लिया और हमारे साथ-साथ ही चलने लगा। लगभग घंटे भर बाद हम लोग भैरोंनाथ के मंदिर पहुंच चुके थे। यहां प्रसाद चढ़ाया, दर्शन किए, बंदरों और लंगूरों से बचते-बचाते कुछ पेट-पूजा की और फोटो वगैरह खींची। यहां से नीचे भवन का नज़ारा बहुत खूबसूरत दिखता है। अब हमें पहुंचना था सांझी छत जहां ‘हमारा हैलीकॉप्टर’ हमारा इंतज़ार कर रहा था।

हैलीपैड दिखा तो दिल धड़का
भैरोंनाथ के मंदिर से आगे का रास्ता सांझी छत पर भवन के पुराने रास्ते में मिल जाता है। हैलीपैड यहां से थोड़ा पहले ही है। आराम-आराम से चलते हुए हम आगे बढ़ रहे थे और बच्चे थे कि बार-बार एक ही सवाल पूछे जा रहे थे-‘पापा, हैलीकॉप्टर में कब बैठेंगे?’ थोड़ी ही देर में एक मोड़ से नीचे हैलीपैड दिखाई देने लगा तो बच्चे उछल पड़े। यहां से एक हैलीकॉप्टर का वीडियो भी बनाया जिसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं। उड़ते-उतरते हैलीकॉप्टर भी दिखने लगे और हमारे पांवों की रफ्तार भी बढ़ने लगी। लेकिन क्या फायदा...? ‘हमारा हैलीकॉप्टर’ अभी बहुत दूर था।

इंतहा नहीं हुई इंतज़ार की
दरअसल दिल्ली में बैठ कर हैलीकॉप्टर की सवारी की ऑनलाइन बुकिंग करवाते समय मैंने दोपहर 1 बजे वाला हैलीकॉप्टर यह सोच कर चुना था कि पता नहीं बच्चों के साथ भवन से कब वापसी हो। लेकिन यहां तो हम सवा ग्यारह बजे ही हैलीपैड पर आ पहुंचे थे। ज़ाहिर है कि अब हमारे पास इंतज़ार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। फिर भी मैंने काउंटर पर बैठे शख्स को जाकर यह बता दिया था कि हमारे पास 1 बजे वाली टिकट है लेकिन अगर वे चाहें तो हमें पहले भी भेज सकते हैं। और यही हुआ भी। साढ़े बारह बजे वाले हैलीकॉप्टर की सवारियों में से सिर्फ 1 ही शख्स मौजूद था। सो, उन्होंने हमें उसी में बिठा दिया। लेकिन मेरी हवा सरकनी तो अभी बाकी थी।

ज़िंदगी के सबसे लंबे वो 4 मिनट
हैलीपैड की इमारत से हम लोग खुशी-खुशी हैलीकॉप्टर की तरफ बढ़ चले थे। हैलीकॉप्टर में खड़े नहीं होना है, मुड़ना नहीं है, फोटो नहीं खींचनी है जैसे निर्देश हमें मिल चुके थे। जैसे ही हम लोग पीछे की तरफ बैठने लगे तो मुझे कहा गया कि सर, आप आगे आ जाएं। हवा सरकनी शुरू हो चुकी थी। दरअसल मुझे ऊंचाई से नीचे देखने पर बहुत डर लगता है। कोई बात नहीं, यहां कौन-सी दिक्कत है, हवाई जहाज में भी तो बैठते ही हैं न। लेकिन आगे बैठने के बाद पता चला कि हैलीकॉप्टर में जिस जगह मैं अपने पांव रख कर बैठा हूं वो हिस्सा पारदर्शी शीशे का बना हुआ है। इधर हैलीकॉप्टर उड़ा और उधर मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। पीछे बैठी हुई आबादी उड़ान के मज़े ले रही थी और इधर अपन दम साधे सामने देख रहे थे। पीछे से ‘पापा वो देखो, पापा उधर देखो’ की आवाज़ें सुन कर दो-एक बार नीचे देखने की कोशिश की तो बची-खुची हवा भी सरक गई। किसी तरह से ज़िंदगी के सबसे लंबे वो 4 मिनट बीते और हम लोग नीचे कटरा शहर से बाहर बने हैलीपोर्ट पर आ उतरे। बच्चे हैलीकॉप्टर की सवारी कर के खुश थे और मैं हैलीकॉप्टर से उतर कर राहत की सांस ले रहा था। हालांकि एयर-प्रैशर की वजह से हम सब के कानों में हल्का-हल्का दर्द भी हो रहा था जो थोड़ी देर में ठीक हो गया। हैलीपोर्ट से बाहर निकले तो सामने एक खूबसूरत इमारत देखी जो लगभग पूरी बन चुकी थी। पता चला कि यह कटरा के रेलवे स्टेशन की इमारत है और साल भर में यहां तक ट्रेन आने लगेगी। भूख ज़ोरों पर थी। फौरन एक ऑटो-रिक्शा पकड़ कर कटरा बस-स्टैंड के पास स्थित मेरे फेवरेट ‘ज्वैल्स’ रेस्टोरैंट पर धावा बोला गया। अभी हमें कटरा में दो रातें बितानी थीं। बहुत जगह घूमना था। बहुत कुछ खरीदना था। किसी से मिलना भी था। पढ़िएगा अगली किस्त में, इस पर क्लिक कर के।

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