Saturday, 29 December 2018

रिव्यू-‘सिंबा’-माईंड ईच ब्लोईंग पिक्चर

-दीपक दुआ...
अगर खबरों में छोटी-सी बच्ची से लेकर बूढ़ी औरतों तक से हो रहे रेप की खबरों को पढ़-सुन कर आपके मन में आता है ऐसा काम करने वालों को तो बीच बाजार में ठोक देना चाहिए या इनका वोही काट देना चाहिए। अगर फलते-फूलते अपराधियों और पुलिस के गठजोड़ की खबरें आपको बेचैन करती हैं और आपका मन करता है कि कोई आए और इस सारे सिस्टम को अपनी पॉवर से बदल कर रख दे तो लीजिए, रोहित शैट्टी आपके लिए सिंबालेकर आए हैं। सिंबा मंझे पोलीस इनिसपैक्टर संग्राम भालेराव। बोले तो-ऐसा फटाका जो बड़ा धमाका करेगा, मगर इंटरवल के बाद।

बचपन में पॉकेट मारते हुए अनाथ सिंबा ने जब देखा कि असली पॉवर तो पुलिस के पास है तो उसने पुलिस वाला बनने की ठान ली। पढ़-लिख कर इंस्पैक्टर बन भी गया लेकिन सिर्फ पैसे कमाने के लिए। मगर फिल्म का हीरो है तो भ्रष्ट होने के साथ-साथ दिल का सच्चा और भावुक मिजाज तो होगा ही। एक हादसे के बाद उसका ईमान जागा और उसने सारे बुरे लोगों की वाट लगा डाली-जाहिर है, अपने ईच इस्टाइल में।

इस कहानी में नया कुछ नहीं है। हिन्दी सिनेमा बरसों पहले ऐसी ढेरों कहानियां परोस चुका है जिनमें पुलिस वाला हीरो बुरे लोगों को खत्म करने के लिए कानून हाथ में लेता है। बेईमान से ईमानदार होते हीरो की कहानियां भी हमने बहुत देख लीं। बावजूद इन सबके यह फिल्म अच्छी लगती है, लुभाती है, बांधती है और सच कहूं तो जकड़ती भी है क्योंकि एक तो इसमें वो मनोरंजन है जो आपको सब कुछ भुला कर आनंदित होने का मौका देता है। दूसरे इसमें वे बातें भी हैं जिन्हें आप अपने समाज में होते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन देख नहीं पाते हैं। आप चाहते हैं कि पुलिस वाले ईमानदार हों, अपराधियों से उनके गठजोड़ हों और वे गलत काम करने वालों का केस, तारीख, ताबड़तोड़ फैसला सुनाएं। लेकिन चूंकि असल में ऐसा नहीं होता है तो यह फिल्म आपको वो सब दिखा कर उद्वेलित भी करती है। स्क्रिप्ट में किंतु-परंतुकी ढेर सारी गुंजाइश, ‘फिल्मीपनेऔर भरपूर ड्रामाके बावजूद रोहित शैट्टी ये सब आपको इतनी रफ्तार से, इतने निखार से, इतनी रंगत से, इतने चुटीले संवादों, इतने धमाकेदार एक्शन, इतने मनभाते चेहरों और इतने थिरकाते गीत-संगीत के साथ परोसते हैं कि आपकी नजरें पर्दे से नहीं हटती हैं। बड़ी बात यह भी है कि यह फिल्म साफ-सुथरा सलीकेदार मनोरंजन देती है जो इन दिनों मसाला फिल्मों से लापता होता जा रहा है। और हां, यह फिल्म गैरमराठियों को मराठी भी सिखाती है। सिनेमा का यह भी एक काम है-दायरे बड़े और दूरियां कम करना।

सिंबा बने रणवीर सिंह छिछोरे, कमीने, भावुक और गुस्सैल होने के तमाम भावों को सहजता से दिखाते हैं। सारा अली खान पर्दे पर चमक लाती हैं। सारा में भरपूर दम है। उनका भविष्य उज्ज्वल है। तमाम दूसरे कलाकार अपनी भूमिकाओं को कायदे से निभाते हैं। अपनी दूसरी फिल्मों के किरदारों को बीच में लाकर रोहित सरप्राइज देने के साथ-साथ अपनी शोमैन-शिप का जलवा भी दिखाते हैं।

सिंबाजैसी फिल्में बताती हैं कि अगर ऊपर बैठे लोग ईमानदार हो जाएं तो नीचे वालों को ईमानदार होना ही होगा। अगर पुलिस चाहे तो अपराध और अपराधियों का सफाया कोई बड़ी बात नहीं। अगर माता-पिता अपने बच्चों को सही रास्ते पर चलना सिखाएं तो कोई बुरी राह पर चले ही नहीं। यह फिल्म देखते हुए हंसी आती है, खुशी होती है, आंखें नम होती हैं, मुठ्ठियां भिंचती हैं, उन भिंची हुई मुठ्ठियों में पसीना आता है। और जब ये सब होता है तो वो फिल्म माईंड-ब्लोईंग कहलाती है, जान लीजिए।
अपनी रेटिंग-साढ़े तीन स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

4 comments:

  1. film ke saath saath aapke bataane ka andaaz MIND BLOWING ....saaukriya

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  2. बहुत ही सुन्दर समीक्षा l

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  3. Great one sir ... Thanks for such clean reviews ... Your reviews helps me to decide to invest time on films you suggest

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  4. दरअसल आम लोगों को ऐसी फिल्में पसंद आ ही जाती हैं जिनमे सिस्टम और बुरे लोगों की वाट लगाई जा रही हो। मुझे रणवीर सिंह बिलकुल पस्सन्द नही इसलिये फिल्म देखने से कतरा रहा हूँ।

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