Friday, 2 September 2016

इंटरव्यू-मनोज तिवारी-जबरा मारे रोवे न दे...



2013 के अगस्त की बात है। बिहार भोजपुरी अकादमी ने लोक-गायिका मालिनी अवस्थी को अपना अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत बनाया तो अब सांसद हो चुके भोजपुरी गायक और अभिनेता मनोज तिवारी ने इसका तगड़ा विरोध किया। इस विवाद के बाद मालिनी को यह पद छोड़ना पड़ा था। आउटलुकसे मुझे कहा गया कि इस मुद्दे पर मनोज से बातचीत की जाए। मनोज से अपनी पहचान रही है। 2011 में गोआ में फिल्म समारोह में वह झप्पियां डाल कर मिले थे। मनोज से तब फोन पर लंबी बातचीत हुई जो आउटलुकमें तो छपी ही हरिभूमिमें भी छपी थी। प्रस्तुत है वह पूरी बातचीत।

-इस विवाद की क्या वाकई जरूरत थी?
-जी बिल्कुल जरूरत थी क्योंकि उन्हें किसी ने ब्रांड अंबेसेडर नियुक्त ही नहीं किया था। खुद बिहार सरकार ने यह कहा कि बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष को यह अधिकार ही नहीं है कि वह किसी को ब्रांड अंबेसेडर बनाएं। तो जब वह बनी ही नहीं तो किस बात की घोषणा की गई थी अकादमी के अध्यक्ष और उनके द्वारा? सवाल बड़ा है इसलिए मैंने इसे उठाया क्योंकि अगर यह सवाल नहीं उठता तो यह सब यूं ही चलता रहता।

-आपको मालिनी अवस्थी के नाम पर एतराज क्यों हुआ?
-नहीं, मुझे मालिनी अवस्थी से कोई मतलब नहीं है। मुझे मतलब है बिहार भोजपुरी अकादमी से, कि क्या यह अकादमी किसी ऐसे व्यक्ति को ब्रांड अंबेसेडर नहीं बना सकती है जिसने भोजपुरी के लिए कुछ किया हो? अगर ब्रांड अंबेसेडर बनाने की जरूरत है भी तो क्या बिहार और भोजपुरी, इन दोनों क्षेत्रों से कोई नहीं है क्या जो आप बाहर से लाकर किसी को ब्रांड अंबेसेडर बना देते हैं। मालिनी अवस्थी तो बिहार से हैं और ही उन्होंने भोजपुरी के लिए कभी कुछ किया है। वह कलाकार हैं और मैं उनका पूरा सम्मान करता हूं लेकिन वह भोजपुरी की कलाकार नहीं हैं यह मैं ही नहीं बल्कि हर कोई जानता है। वह दूसरों के गीत गाती हैं। उनका गाया एक भी भोजपुरी गीत लोगों को नहीं पता है।

-क्या कारण देखते हैं आप इस सारे प्रकरण के पीछे?
-अब तो सब पानी की तरह साफ हो चुका है कि यह सब बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष आर.के. दुबे और मालिनी अवस्थी का आपस का गठजोड़ था क्योंकि बिहार सरकार साफ-साफ कह चुकी है कि सरकार की तरफ से किसी को भी इस तरह का कोई ऑफर नहीं दिया गया। दुबे जी को एक चपरासी तक नियुक्त करने का अधिकार नहीं है, ब्रांड अंबेसेडर तो बहुत दूर की बात है।

-आपकी राय में किसे इस पद के लिए चुना जाना चाहिए था?
-पहली बात तो यही कि इस पद की आवश्यकता ही क्यों है? और चलिए अगर है भी तो हमारे पास शारदा सिन्हा जैसी गायिका हैं जिन्हें राष्ट्रपति से पद्मश्री मिल चुका है, उनके गाए हुए सैंकड़ों गाने लोगों की जुबान पर हैं। उनके आलोचक भी उनके प्रशंसक हैं और वह निर्विवाद रूप से इस पद के योग्य हैं। हमारे पास भरत शर्मा हैं, रवि किशन हैं। और भी बहुत सारे कलाकार हैं और अगर चुनना ही है तो इनमें से चुनिए।

-भोजपुरी के क्षेत्र में और भी बहुत से लोग हैं लेकिन विरोध आपने ही क्यों किया?
-दरअसल मुझे इसी अकादमी ने एक महीने पहले सम्मानित किया था। और विरोध करने के लिए मैं कोई धरने पर तो बैठा नहीं था। मेरा बस इतना कहना था कि जो अकादमी भोजपुरी के कल्याण के लिए बनी है, जो भोजपुरी की सेवा के लिए मुझे सम्मान देती है वह किसी गैर-भोजपुरी व्यक्ति को अगर ब्रांड अंबेसेडर बनाती है तो यह भोजपुरी इंडस्ट्री और भोजपुरी जनता का अपमान है और मैं इसे सहन नहीं कर सकता इसलिए मुझसे यह सम्मान वापस ले लिया जाए।

-लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इस विरोध के जरिए मनोज तिवारी असल में अपनी राजनीति चमकाना चाह रहे हैं?
-इसमें राजनीति कहां से गई, यह मेरी समझ से बाहर है। अगर मुझे खुद को चमकाना होता तो मैं धरना-प्रदर्शन करता, मोर्चा निकालता। लेकिन मैंने पहले तो सवाल पूछे और जब चार दिन तक मुझे मेरे सवालों के जवाब नहीं मिले तो मैंने सम्मान लौटा दिया और उसके बाद से अब तक मेरी तरफ से कहीं कोई बयान नहीं आया है। राजनीति करने वाले मेरी तरह चुप नहीं बैठते हैं।

-किन सवालों के जवाब चाह रहे थे आप?
-मैंने पूछा था कि बिहार भोजपुरी अकादमी के ब्रांड अंबेसेडर की आवश्यकता क्यों? क्या परंपरा है ब्रांड अंबेसेडर नियुक्त करने की? अगर नहीं है तो क्या आपने इसके लिए कोई जूरी बनाई? और अगर बनाई तो उसमें कौन लोग शामिल थे? बस, ये सीधे-से सवाल थे मेरे और अगर इनका जवाब देने की बजाय वे कहते हैं कि मनोज तिवारी राजनीति कर रहा है तो यह मेरी समझ से बाहर है। यह भी सुनने में आया कि मनोज तिवारी को ब्लैक लिस्ट कर देंगे तो आज तक उन्होंने मुझे कोई प्रोग्राम तो दिया नहीं है, तो ब्लैक लिस्ट क्या करेंगे?

-सम्मान लौटाने की क्या आवश्यकता थी। विरोध तो किसी और तरीके से भी किया जा सकता था?
-भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में लाने के लिए इस अकादमी या इसके अध्यक्ष ने क्या किया? और जो लोग भोजपुरी के लिए काम कर रहे हैं आप उन्हें नकारने का उपक्रम करके यह ब्रांड अंबेसेडर पद घोटाला करते हैं और यह भी चाहते हैं कि मनोज तिवारी चुप रहे तो भैया, ऐसा तो नहीं होगा। आप भोजपुरी का अपमान करें और मनोज तिवारी को सम्मनित करें, ऐसा भी नहीं होगा। हमारे भोजपुरी में एक कहावत होती है-जबरा मारे, रोवे दे। पर मनोज तिवारी ऐसे लोगों में से नहीं है। उसे मार पड़ेगी तो वह रोएगा भी और आवाज भी उठाएगा।

-अब तो मालिनी अवस्थी ने बाकायदा पत्र लिख कर अपनी स्वीकृति वापस ले ली है?
-ले क्या ली, लेनी पड़ी उन्हें। देखिए, मेरा उनसे बिल्कुल भी विरोध नहीं हैं। बतौर कलाकार उनका हम सम्मान करते हैं। लेकिन उन्हें भी तो भोजपुरी के दिग्गज कलाकारों का सम्मान करना चाहिए था न।
 

-तो अब आप अपना लौटाया हुआ सम्मान वापस ले लेंगे?
-बिल्कुल नहीं। कितने दिनों से मेरा प्रतिनिधि बिहार भोजपुरी अकादमी को वह सम्मान लौटाने के लिए जा रहा है लेकिन वहां कोई मिल ही नहीं रहा है। लेकिन अब मैं यह सम्मान तब तक वापस नहीं लूंगा जब तक आर.के. दुबे अपनी गलती को मानते हुए क्षमायाचना नहीं करते।
-दीपक दुआ

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