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रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

जब ऑनर (मान) ही बच गया तो फिर काहे की किलिंग...?’दूसरी जात के लड़के से शादी कर रही लड़की जब अपने पिता से यह पूछती है तो पिता को कोई जवाब नहीं सूझता। देखा जाए तो यही रास्ता अपना कर हमारा आज का समाज भी दूसरी जात वालों को अपना रहा है। वरना कुछ समय पहले तक जहां अलग-अलग जाति के लड़का-लड़की घर से भाग कर शादी करते थे वहीं आज ऐसी बहुत सारी शादियां दोनों परिवारों की रज़ामंदी से होने लगी हैं ताकि दोनों तरफ का ऑनर बचा रहे। दिल्ली में साथ पढ़े-लिखे, साथ नौकरी कर रहे और एक ही घर में साथ रह रहे बिहार के लड़के और राजस्थान की लड़की को पता है कि जात-बिरादरी को नाक पर रखने वाले उनके घरवाले इस शादी के लिए राज़ी नहीं होंगे। सो, वे दोनों किराए के मां-बाप ले आते हैं। एक बार लड़के के घर में शादी होती है और दूसरी बार लड़की के घर में। हो गए न 7 और 7 यानी 14 फेरे? लेकिन क्या यह सब होना इतना आसान है? और क्या सच कभी सामने नहीं आएगा? मेरे बाबूजी नहीं मानेंगे’ या ‘मेरे पापा तो मुझे मार ही डालेंगे’ किस्म की बातें कहते-सुनते नई पीढ़ी वाले चाहते हैं कि कोई रास्ता निकल आए। पर पुरानी पीढ़ी उस रास्ते को माने तब न। यह फिल्म जो राह दिखाती है वह भले ही ‘फिल्मी’ हो लेकिन गलत नहीं लगती। लड़का-लड़की भागने की बजाय हालात का सामना करते हैं। नकली मां-बाप के ज़रिए फिल्म हमारे समाज की उस सोच पर भी प्रहार करती है जहां असली मां-बाप अपने बच्चों की खुशी से ज़्यादा ‘लोग क्या कहेंगे’ को तवज्जो देने लगते हैं। मनोज कलवानी अपने लेखन से संतुष्ट करते हैं। हां, हास्य की डोज़ थोड़ी और बढ़ा कर वह इस फिल्म को ज़्यादा रोचक बना सकते थे। देवांशु सिंह के निर्देशन में परिपक्वता है। कई जगह उन्होंने बेहतरीन तरीके से सीन संभाले हैं। लोकेशन असरदार हैं और गीत-संगीत फिल्म के माहौल के अनुकूल रहा है। संवाद पैने हैं। भोजपुरी और राजस्थानी बोलियों का इस्तेमाल फिल्म को असरदार बनाता है। एक्टिंग सभी की उम्दा है। विक्रांत मैस्सी तो छंटे हुए अभिनेता हैं ही, कृति खरबंदा भी उनका पूरा साथ निभाती हैं। हीरो की मां के किरदार में यामिनी दास असर छोड़ती हैं। बहू के स्वागत वाले सीन में उनके हावभाव और बैकग्राउंड में रेखा भारद्वाज की आवाज़ में बजता ‘राम सीता संग द्वारे पे खड़े हैं आओ सखी...’ देख कर कानों में शहद घुलता है तो आंखों में समुंदर उमड़ता है। विनीत कुमार, मनोज बक्शी, जमील खान, गौहर खान, प्रियांशु सिंह, गोविंद पांडेय, सुमित सूरी, भूपेश सिंह जैसे कलाकार दम भर साथ निभाते हैं। सही है कि ज़ी-5 पर आई यह फिल्म बहुत पैनी नहीं बन पाई है। कहीं लेखन हल्का रहा तो कहीं निर्देशन। कुछ और कसावट, कुछ और सजावट, कुछ और बुनावट इस फिल्म को उम्दा बना सकती थी। लेकिन यह फिल्म बुरी नहीं है। यह साफ संदेश दे जाती है कि जात-बिरादरी और अपने कथित ‘ऑनर’ के नाम पर अगर पुरानी पीढ़ी लीक पीटेगी तो नई पीढ़ी के पास अपनाने को झूठ का रास्ता ही बचेगा। सामाजिक गांठों को खोलने की ऐसी कोशिशें होती रहनी चाहिएं।

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