Wednesday, 5 August 2020

यात्रा-कटरा में बिताइए दो दिन, मज़ा आएगा (भाग-6)

-दीपक दुआ...
पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि सांझी छत से मात्र 4 मिनट की अपनी हैलीकॉप्टर यात्रा ने मेरी कैसी तो बुरी हालत कर दी थी। कटरा बस स्टैंड के पास स्थित मेरे फेवरेट ‘ज्वैल्स’ रेस्टोरैंट में लंच करने के बाद हम लोग अपने होटल में आकर सो गए और फिर शाम को अपने होटल से सटे हुए एक पार्क में टहलने जा पहुंचे। यह एक बहुत बड़ा और खूबसूरत पार्क है जो चिंतामणि मंदिर के सामने है। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) इसके बाद हम लोग चिंतामणि मंदिर में जा पहुंचे। यह कटरा का एक बहुत ही विशाल मंदिर है जिसमें रहने के लिए भी काफी सारे कमरे हैं। वैष्णो देवी की यात्रा में बसें भर-भर कर ले जाने वाली बहुत सारी संस्थाएं अपने यात्रियों को यहीं ठहराती हैं। अब मुझे अपने दोस्त अनिल से मिलना था जिसकी वहीं पास ही में अखरोट आदि की दुकान है। अनिल से मेरी दोस्ती कुछ साल पहले यहीं कटरा में हुई थी और उसके बाद से मैं जब भी यहां गया मैंने अखरोट उसी से खरीदे। जम्मू-कटरा में अखरोट को लेकर ठगने के काफी मामले सामने आते हैं कि दुकानदार ने दिखाए तो वे अखरोट जो हाथ में लेते ही टूट जाएं लेकिन घर पहुंच कर थैले में से निकले ऐसे अखरोट, कि हथोड़ी टूट जाए मगर अखरोट नहीं। अपने साथ यह ठगी 1996 में हो चुकी थी जिसके बाद 1998 में कटरा के एक दुकानदार से दोस्ती हुई और बरसों तक उनसे मिलना-जुलना व अखरोट खरीदने का सिलसिला चलता रहा। फिर उन्होंने अपना काम बदल लिया जिसके बाद संयोग से अनिल से दोस्ती हो गई। अनिल से जिस जगह पर मेरी दोस्ती हुई थी, वो जगह कटरा के करीब ही है और मेरी पसंदीदा जगहों में से है। यहां मैं हर बार ज़रूर जाता हूं। इस बार भी गया। आगे उसका भी ज़िक्र करूंगा।

Tuesday, 4 August 2020

यात्रा-सांझी छत से हैलीकॉप्टर की सवारी (भाग-5)

-दीपक दुआ...
भैरोंनाथ के मंदिर से दिखता भवन
मां वैष्णों के भवन पर पूरी रात आसमान तले कड़कती ठंड में सोने के बाद सुबह 8 बजे हम लोग भवन से चल दिए। अब हमारा रुख भैरांनाथ के मंदिर की तरफ था। मान्यता अनुसार भैरोंनाथ के मंदिर के दर्शनों के बिना वैष्णो देवी की यात्रा संपूर्ण नहीं मानी जाती और माता के दर्शनों के बाद ही भैरों बाबा के दर्शन किए जाते हैं। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) भैरों घाटी की चढ़ाई कठिन है और इस रास्ते पर खाने-पीने की सुविधाएं भी नहीं हैं। थोड़ा आगे चले ही थे कि एक पिठ्ठू ने पूछा-बिटिया को कंधे पर ले चलूं साहब? बिटिया भी यह सुन कर खुश हुई। दीपाक्षी को अपने कंधों पर बिठा कर उस पिठ्ठू ने हमारा बैग भी ले लिया और हमारे साथ-साथ ही चलने लगा। लगभग घंटे भर बाद हम लोग भैरोंनाथ के मंदिर पहुंच चुके थे। यहां प्रसाद चढ़ाया, दर्शन किए, बंदरों और लंगूरों से बचते-बचाते कुछ पेट-पूजा की और फोटो वगैरह खींची। यहां से नीचे भवन का नज़ारा बहुत खूबसूरत दिखता है। अब हमें पहुंचना था सांझी छत जहां ‘हमारा हैलीकॉप्टर’ हमारा इंतज़ार कर रहा था।

Monday, 3 August 2020

रिव्यू-अमेज़िंग ‘शकुंतला देवी’ की नॉर्मल कहानी

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पांच साल की एक बच्ची चुटकियों में गणित की मुश्किल से मुश्किल गणनाएं कर देती है। कभी स्कूल तक नहीं गई इस बच्ची ने देश-विदेश में अपनेमैथ्स शोज़के ज़रिए भरपूर नाम, शोहरत, पैसा कमाया। कम्प्यूटर से भी तेज़ कैलकुलेशन करने के कारण उसेह्यूमैन कम्प्यूटरतक कहा गया।गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्डमें उसका नाम भी आया। वह महान गणितज्ञ कहलाई, मशहूर ज्योतिषी बनीं, इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव में उतरी। उसने गणित, ज्योतिष, समलैंगिकता पर किताबें लिखीं, कई उपन्यास लिखे। उसी की ज़िंदगी पर बनी है यह फिल्म। कहिए है वह एक अमेज़िंग हस्ती...! काश, कि यह फिल्म भी उतनी ही अमेज़िंग हो पाती।

यात्रा-आसमान तले बीती रात (भाग-4)

-दीपक दुआ...
मां वैष्णो के भवन को दूर से देख कर ही हमारे भीतर नई उर्जा का संचार होने लगा था। कुछ ही देर में यह नया वाला रास्ता पुराने रास्ते पर मिल गया। यहां फिर से हमारे सामान और हमारी जांच हुई। यहां स्थित श्राइन बोर्ड की दुकान से प्रसाद के थैले खरीदे। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) जिन यात्रियों को जानकारी नहीं होती वे कटरा की दुकानों से प्रसाद, नारियल आदि महंगे दामों पर खरीद कर 14 किलोमीटर की चढ़ाई में ढोते रहते हैं जबकि भवन से ठीक पहले ही सरकारी दुकान है जहां उचित दामों पर प्रसाद मिल जाता है। यहां एक और छोटी-सी दुकान है जहां पर माता के ऊपर चढ़ाए गए चोले, चुन्नियां, छत्र आदि भी बिकते हैं। यहीं हमने दर्शन की उस पर्ची पर नंबर डलवाया जो हमने कटरा में बनवाई थी।

Sunday, 2 August 2020

यात्रा-सुकून से हुई भवन तक की यात्रा (भाग-3)

-दीपक दुआ...
दर्शनी दरवाजा
दोपहर करीब सवा बारह बजे हम लोग अपने होटल से वैष्णो देवी की चढ़ाई के लिए निकल पड़े। सड़क पर आते ही ऑटो-रिक्शा वाले ‘बाण गंगा दस रुपए सवारी’ कह कर पीछे पड़ गए लेकिन मैं हमेशा ही जाते समय तो पैदल ही गया हूं। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) तो, गोलगप्पे खाते और बाईं तरफ नीचे के सुंदर दृश्य देखते हुए करीब 15 मिनट में हम लोग वहां पहुंच गए जहां से वैष्णों देवी की यात्रा की औपचारिक चढ़ाई शुरू होती है और जिस जगह का नाम है-दर्शनी दरवाजा। पर अभी तो सिर्फ शुरूआत हुई थी, सफर तो अभी बाकी था।

Saturday, 1 August 2020

यात्रा-कटरा से पहले देवा माई और भूमिका मंदिर (भाग-2)

-दीपक दुआ...
देवा माई मंदिर
जम्मू से चल कर मां वैष्णो के पहले दर्शन कौल कंडोली में करने के बाद अब हमारी गाड़ी कटरा की तरफ बढ़ रही थी। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) लेकिन कटरा पहुंचने से पहले हमें अभी दो जगह और जाना था। बहुत जल्द हम अपने अगले पड़ाव यानी देवा माई मंदिर पर जा पहुंचे। यह जगह जम्मू से लगभग 44 किलोमीटर दूर है और यहां से कटरा सात-आठ किलोमीटर आगे है। मुख्य सड़क से बाईं ओर ऊपर की तरफ जाने वाली सड़क से जब हम लोग यहां पहुंचे तो यहां कोई भी मौजूद नहीं था। दरअसल पुराने ज़माने में तो भक्तगण यहां फिर भी आते थे लेकिन बढ़ती परिवहन सुविधाओं ने वैष्णो देवी की यात्रा का जो स्वरूप बदला है उससे बहुत सारी पारंपरिक चीज़े पीछे छूट गई हैं और छूटती जा रही हैं। देवा माई असल में माता के अनन्य भक्त पंडित श्रीधर के वंशज पंडित श्यामी दास का घर था और मान्यता है कि माता ने उनके घर में कन्या-रूप में जन्म लिया था जिसका नाम पंडित जी ने माई देवा रखा था।