Monday, 27 April 2020

बुक रिव्यू-आधी हकीकत आधा फसाना सुनाती ‘हज़ारों ख्वाहिशें’


-दीपक दुआ... 
कॉलेज लाइफ की कहानियां, होस्टल लाइफ की कहानियां, दिल्ली शहर की कहानियां, आई..एस. बनने वालों की कहानियां... हाल के बरसों में नई वाली हिन्दी में इन विषयों पर इतना कुछ चुका है कि अब ऐसे किसी विषय पर आए उपन्यास को छूने का भी मन करे। हिन्द युग्म से आए इस उपन्यास को भी पढ़ना शुरू किया तो लगा कि सत्य व्यास के बनारस टॉकीज़और नीलोत्पल मृणाल के डार्क हॉर्सको पढ़ने के बाद इसमें नया कुछ नहीं मिलने वाला। लेकिन धीरे-धीरे यह कहानी अपनी एक अलग राह तलाशने लगती है और बहुत जल्द उस राह पर सरपट भी हो जाती है।

Tuesday, 21 April 2020

ओल्ड रिव्यू-अनछुए विषय पर स्वस्थ मनोरंजन ‘विकी डोनर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
किसी संवेदनशील विषय को कैसे उठाया जाता है इसे निर्देशक शुजित सरकार करीब सात साल पहले आई अपनी पिछली और पहली फिल्म यहांमें दिखा चुके हैं। कश्मीर के हालात की पृष्ठभूमि में एक आतंकवादी की बहन और एक फौजी अफसर की प्रेम कहानी दिखाने के बाद अपनी इस फिल्म में शुजित स्पर्म डोनेशन जैसे अनछुए विषय की पृष्ठभूमि में एक पंजाबी लड़के और एक बंगाली लड़की की लव स्टोरी लेकर आए हैं।

Thursday, 16 April 2020

वेब-रिव्यू : बिना कहानी जम गई ‘पंचायत’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अबे गांव में नौकरी मिल रही है। यही उम्र है कर ले एडवेंचर।
सिंपल ज़िंदगी चाहिए यार। नहीं करना मुझे एडवेंचर।
लेकिन पढ़ाई-लिखाई में औसत रहे शहरी बाबू अभिषेक त्रिपाठी अब बेमन से पहुंच गए हैं जिला बलिया के गांव फुलेरा के पंचायत सचिव बन कर। दिन भर पंचायत के सरकारी काम करते हैं और रात में एम.बी.. की तैयारी। कई महीने बाद भी गांव को तो वह नहीं अपना पाए अलबत्ता गांव ने उन्हें ज़रूर अपना लिया है।

Monday, 13 April 2020

ओल्ड रिव्यू-सच और साहस की कहानी ‘लगान'

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अपने पिछले आलेख (यहां क्लिक करें) में मैंने 15 जून, 2001 को ‘लगान’ देखने और उस पर लिखी सत्यजित भटकल की किताब का उल्लेख किया था। इस किताब का हिन्दी अनुवाद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज जी ने किया था और दिसंबर, 2019 में उसकी एक प्रति मुझे उपहार में दी थी। अब प्रस्तुत है जून, 2001 में लिखी लगानकी मेरी समीक्षा जो उस दौर की लोकप्रिय फिल्म मासिक पत्रिका चित्रलेखाके मेरे कॉलम इस माह के शुक्रवारमें छपी थी। पढ़िए ज़रा और बताएं कि आज से 20 बरस पहले लिखी वह समीक्षा आज कहां ठहरती है।

किताब-‘ऐसे बनी लगान’-एक असंभव फिल्म के बनने की अद्भुत दास्तान

-दीपक दुआ...
15 जून, 2001-शुक्रवार। दिल्ली के प्लाज़ा सिनेमा में दोपहर 12 बजे के शो में फिल्म समीक्षकों को गदर-एक प्रेमकथादिखाई गई। थिएटर के बाहर-भीतर की भीड़, फिल्म देख कर निकले दर्शकों के उत्साह और खुद अपने आकलन से यह तय हो चुका था कि हम अभी-अभी एक ऐसी फिल्म देख कर निकले हैं जो सिर्फ सुपरहिट होने जा रही है बल्कि आने वाले कई दशकों तक इसे देखा और याद किया जाएगा। बावजूद इसके हमें इंतज़ार था शीलासिनेमा में साढ़े चार बजे शुरू होने वाले लगानके शो का। अपनी पौने तीन घंटे की लंबाई के चलते आम फिल्मों की तरह एक दिन में चार नहीं बल्कि तीन शो में चल रही यह फिल्म निर्माता के तौर पर आमिर खान की पहली फिल्म थी। फिल्म के बारे में कई साल से चर्चाएं हो रही थीं और छन-छन कर जो कहानियां बाहर आई थीं उनसे साफ था कि यह हिन्दी सिनेमा की चंद अनोखी, अकल्पनीय फिल्मों में से होगी। कैसी होगी, यही देखना था। हालांकि इससे करीब पांच महीने पहले आमिर मेलाजैसी घटिया और नाकाम फिल्म दे चुके थे लेकिन लगानके प्रति फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया और दर्शकों में ज़बर्दस्त उत्साह था। खुद मेरे मन में आमिर की छवि के चलते यह उम्मीद जवां थी कि चाहे कुछ हो, ‘लगानएक उम्दा फिल्म ज़रूर होगी। उसी शाम शीलासिनेमा में इस बात की पुष्टि भी हो गई।