Wednesday, 8 May 2019

रिव्यू-काश, थोड़ी और सैट होती ‘सैटर्स’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
अक्सर खबरों में दिखाई-सुनाई देता है कि फलां इम्तिहान में जम कर नकल चली, असली उम्मीदवार की जगह कोई और पेपर देता पकड़ा गया या पैसे लेकर सैटिंग हुई और पेपर पहले ही लीक हो गए। मन करता है यह जानने का कि आखिर वे कौन लोग हैं जो सैटिंग के इन कामों को अंजाम देते हैं? कैसे करते हैं ये लोग हर लेवल पर जाकर ऐसी सैटिंग कि किसी को पता भी नहीं चलता? या फिर पता तो सब को होता है लेकिन कोई सामने नहीं आता? तो क्या इस खेल में सिस्टम और उसकी मशीनरी भी शामिल होती है? अश्विनी चौधरी की यह फिल्म इन सारे सवालों के जवाब तलाशती है और खुल कर इस छुपे हुए खेल को दिखाती है जिसे करने वालों को सैटर्स कहा जाता है।

बनारस के बाहुबली भैया जी का चेला अपूर्वा हर तरह के पेपर लीक कराने और पैसे ले-दे कर हर किस्म की सैटिंग करने में माहिर है। दिक्कत तब शुरू होती है जब उसी के दोस्त रहे पुलिस अफसर आदित्य को सैटिंग के इस खेल का पर्दाफाश करने का काम मिलता है। ये दोनों ही अपने-अपने काम में उस्ताद हैं और इसीलिए इनके बीच चल रही पकड़म-पकड़ाई में कभी एक का, तो कभी दूसरे का पलड़ा भारी होता दिखता है लेकिन अंत तक यह फैसला नहीं हो पाता कि इनमें से जीता कौन? और देखा जाए तो यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है। यह फिल्म सैटिंग के खेल को करीब से, गहराई से और बारीकी से दिखाती है। देख कर हैरानी होती है, अफसोस होता है और गुस्सा भी आता है कि किस तरह से काबिल लोगों को पीछे धकेल कर कुछ पैसे वाले लोग सिस्टम की चूलें हिलाते हैं और वहां जा बैठते हैं जहां उन्हें नहीं होना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि अपने तमाम गहरे रिसर्च के बावजूद यह फिल्म कुछ कहतीनहीं है, यह व्यवस्था की इन खामियों के उपजने के कारणों में नहीं जाती और ही उन पर कोई टिप्पणी करती है। हां, जो कुछ भी यह दिखाती है, उसे कायदे से दिखाती है। लेकिन कोई भी कहानी सिर्फ देखनेके लिए तो नहीं देखी जाती ...!

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है वास्तविक लोकेशंस पर इसकी शूटिंग और बनारस, दिल्ली, जयपुर जैसी इन जगहों का भरपूर दोहन। फिल्म के किरदारों का वास्तविक चित्रण भी इसे दर्शनीय बनाता है। श्रेयस तलपड़े बेहद सधा हुआ अभिनय करते दिखाई देते हैं। आफताब शिवदासानी जैसे सीमित रेंज वाले अभिनेता भी जब प्रभावित करें तो इसे निर्देशक का कमाल ही कहेंगे। पवन मल्होत्रा बताते हैं कि अदाकारी का पाठ कैसे पढ़ा और पढ़ाया जाता है। नीरज सूद, विजय राज़, पंकज झा, मनु ऋषि, अनिल चरणजीत, जमील खान आदि खूब लुभाते हैं। लड़कियों में निहारिका कुंडू और ईशिता दत्ता की तो फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी। अकेली सोनाली सैगल ग्लैमर और एक्टिंग, दोनों का कोटा पूरा करने के लिए काफी हैं। 

फिल्म कई सारे सवालों के जवाब नहीं देती। बनारस में भैया जी का इतना दबदबा क्यों है? अपूर्वा और आदित्य के बीच इतनी रंजिश क्यों है? अपूर्वा और आदित्य को अतीत के दोस्त बताने की ज़रूरत ही क्या थी? पुलिस की तगड़ी तुड़ाई भी पकड़े गए लोगों को तोड़ क्यों नहीं पाती? अपूर्वा के अपोज़िट हीरोइन है ही क्यों? इनके अलावा सबसे बड़ा सवाल तो यह कि ईमानदारों बेईमानों की इस लड़ाई में हम दर्शक किसके प्रति सुहानुभूति रखें-हर बार नाकाम होते ईमानदार पुलिस वाले के प्रति या हर बेईमानी में कामयाब होते कहानी के नायकके प्रति? कहानी को बिना किसी मकाम तक पहुंचाए फिल्म का खत्म हो जाना इसके सीक्वेल की संभावना भले ही उपजाता हो, फिलहाल हमारी उत्सुकता को शांत नहीं कर पाता और इसीलिए यह फिल्म अधूरी-सी लगती है। इसे देखने के बाद यह कसक मन में रह जाती है कि काश, यह और अच्छी तरह से सैट की गई होती।

(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि फिल्म कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

2 comments:

  1. फिर भी आपको रेटिंग जरूर देनी चाहिए,
    हम नादान हैं इस मामले में,
    आपका रिव्यु और रेटिंग दोनों ही जरूरी होते हैं,
    यह निर्णय लेने में कई फ़िल्म देखने जाएं या नहीं।।

    :- सोलंकी

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    1. आपके सुझाव का स्वागत है... बरसों पहले जब मैंने फिल्मों के रिव्यू लिखने शुरू शुरू किए थे तो अपने संपादक को इस बात के लिए राज़ी किया था कि हम रेटिंग न दें, बरसों तक ऐसे ही चला, लेकिन फिर भेड़ चाल ने मुझे भी लपेटे में ले लिया और बाज़ार के, पाठकों के दबाव में मैं रेटिंग परंपरा पर चल पड़ा... जबकि एक विस्तृत रिव्यू अपने आप में खुद सब कुछ कह देता है... और रेटिंग देने की प्रथा ने पाठकों की पढ़ने की आदत भी कम की है, उतावलेपन में सिर्फ रेटिंग से काम चलाने वाले पाठक तुरत-फुरत फैसला लेते हैं, जबकि एक अच्छी समीक्षा फिल्म के अच्छे-बुरे, हर पक्ष को समेटे हुए होनी चाहिए ताकि पाठक को समग्र तस्वीर मिल सके... अभी पढ़िए, यदि नादानों का बहुमत हुआ, तो फिर पुराने ढर्रे पर चल देंगे अपन... शुक्रिया...

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