Thursday, 2 May 2019

रिव्यू-इतनी भी कोरी नहीं ‘ब्लैंक’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
एक युवक को रोड-एक्सीडैंट के बाद अस्पताल लाया जाता है। डॉक्टर पाते हैं कि उसके सीने पर ऑपरेशन के ज़रिए एक बम कुछ इस तरह से फिट है कि उसकी धड़कन रुकी तो बम फटा। युवक को याद नहीं वह कौन है-आतंकवादी या कोई और। पुलिस उसे मारना चाहती है। तभी पता चलता है कि इस बम से 24 बमों को सिग्नल जा रहे हैं। यह फटा तो वे भी फटे। पुलिस जुटी है सारे खेल का खात्मा करने में। अंत में एक ट्विस्ट आता है और...!

अच्छी कहानी है। हटके है। इसका ट्रीटमैंट भी हटके वाला है। कुछ ही घंटों में सारी घटनाएं होने से इसमें रफ्तार और उत्सुकता बनी रहती है। इसकी कसावट दर्शक को बांधे रखती है और एक भी सीन के लिए बाहर नहीं जाने देती। लेकिन यह फिल्म कमियों से परे नहीं है। इस किस्म की फिल्मों में जिस तरह के और जितनी मात्रा में तनाव की दरकार होती है, वह इसमें काफी हल्का और कम है। फिल्म का लेखन पक्ष कमज़ोर है। बार-बार ऐसी लगता है कि चीज़ें जिस तरह से हो रही हैं, उन्हें बदला जा सकता था। अंत में जो ट्विस्ट आता है, वह चौंकाता और सुहाता भले हो लेकिन कई सवाल भी खड़े करता है कि अगर इसी तरह से सब होना था तो वह सब क्यों हुआ जो हो रहा था। फिल्म के संवाद बेदम हैं। ऐसी फिल्म में दो-चार तालियां बटोरने वाले डायलॉग हों तो मज़ा अधूरा रह जाता है। आतंकवादियों के सरगना को नफीस उर्दू में बोलते देख कर हंसी आती है।

करण कपाड़िया (डिंपल कपाड़िया की स्वर्गीया बहन सिंपल के बेटे) में हीरो वाली बात अभी नहीं दिखती। बंदा एक्शन करने में तो ठीक है लेकिन डायलॉग बोलते समय फैल जाता है। शायद इसीलिए उन्हें दाढ़ी वाला गैटअप दिया गया ताकि उनके भावहीन चेहरे की कमियां छुपाई जा सकें। बिना हीरोइन, बिना इश्क-मोहब्बत वाली फिल्म से अपनी शुरूआत करके उन्होंने साहस दिखाया है। शायद सॉफ्ट किरदारों में वह जंचे। सनी देओल ने अपनी उम्र के मुताबिक किरदार निभाया और अच्छे लगे। शहर को आतंक से बचाने में जुटे अफसर का बीच-बीच में फोन पर अपने भटके हुए बेटे से बात करना कहानी को इमोशनल रुख देता है। करणवीर शर्मा और ईशिता दत्ता अपनी भूमिकाओं में सही रहे हैं।

डायरेक्टर बहज़ाद खंबाटा की यह पहली फिल्म है और उनके काम में अनुभवहीनता साफ झलकती है। तकनीकी तौर पर भी फिल्म हल्की मालूम होती है। अलबत्ता एक्शन और एडिटिंग में कसावट है। ऐसी फिल्मों में गीत-संगीत नहीं होना चाहिए। यहां भी नहीं है। लेकिन अंत में आकर दो गाने डालने से फिल्मकार खुद को नहीं रोक पाए और फिल्म को और हल्का ही कर गए। यह फिल्म हल्की तो है लेकिन आम दर्शकों की एक्शन-थ्रिलर वाला मसाला देखने की चाहत को यह काफी हद तक पूरा भी करती है। लेकिन इसका नाम इसके आड़े आएगा। आम दर्शक-वर्ग को खट से समझ में आने वाला कोई चटकीला नाम ज़्यादा मारक हो सकता था।
अपनी रेटिंग-दो स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

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