Saturday, 8 September 2018

रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’

-दीपक दुआ...
कुछ सैनिक। उनके परिवारों की कहानियां। सरहद पर एक सच्ची लड़ाई। जोश, जज़्बा, देशप्रेम... बन गई बॉर्डर’। एक उम्दा, क्लासिक वाॅर-फिल्म।

फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात... बन गई एल..सी. कारगिल क्लासिक सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म।

एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां। एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव... बन गई पलटन लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न।

एक ही फ़ॉर्मूले पर और एक ही शैली में कई सारी फिल्में बनाना कोई गलत नहीं। लगभग हर फिल्मकार ने ऐसा किया है, करता है। लेकिन अगर आपके फ़ॉर्मूले का गाढ़ापन कम और आपकी शैली की धार भोथरी होती चली जाए तो फिर ऐसी ही फिल्में बनेंगी, जो ज़रूरी होते हुए भी कमज़ोर होंगी, नाकाबिल--तारीफ होंगी।

अपने यहां की युद्ध आधारित फिल्मों में हमारा दुश्मन आमतौर पर पाकिस्तान ही रहा है जबकि सच यह भी है भारत-चीन के संबंध भी कभी बहुत मीठे नहीं रहे, आज भी नहीं है। चेतन आनंद की हकीकतज़रूर 1962 के भारत-चीन युद्ध की बात करती है लेकिन उस लड़ाई में चीन के हाथों बुरी तरह से हारने के पांच साल बाद नाथू ला और चो ला की लड़ाई की कहानी तो शायद इतिहास के छात्रों को भी याद हो। जे.पी. दत्ता की यह फिल्म उसी नाथू ला की लड़ाई के बारे में है जिसमें अगर भारतीय सेना जीती होती तो मुमकिन है कि आज सिक्किम का नाम चीनी नक्शे में होता।

लेकिन वह लड़ाई आम लड़ाइयों जैसी नहीं थी। एक-दूसरे से चंद मीटर की दूरी पर बैठे हिन्दुस्तानी और चीनी सिपाही वहां गोलियों से नहीं बल्कि गालियों, धक्कों, पत्थरों से लड़ रहे थे। कह सकते हैं कि वह लड़ाई शारीरिक से ज़्यादा मानसिक तौर पर लड़ी जा रही थी। दत्ता ने उसे पूरी ईमानदारी से दिखाया भी है। लेकिन इस किस्म की फिल्म में जो नाटकीयता, जो आक्रामकता, जो व्यापकता और जो विशालता होनी चाहिए (जिसकी लत भी हमें दत्ता ने ही लगाई), उसकी कमी इस फिल्म को सर्वदा शक्तिशाली होने से रोक देती है। सैनिकों की बैक-स्टोरी का उसी पुराने घिसे-पिटे स्टाइल में होना, दमदार संवादों की कमी और सबसे बढ़ कर दमदार अभिनेताओं की कमी भी इस फिल्म को सिर्फ एक औसत फिल्म ही बना पाती है। क्लाइमैक्स में शहीद सैनिकों के अस्थि-कलशों का घर आना आंखें नम करता है।

हालांकि सभी कलाकारों की मेहनत दिखती है लेकिन ऊपर वाले ने उन बेचारों की रेंज ही
सीमित बनाई है तो वो भी क्या करते। फिल्म में कई जगह चीनी संवादों के नीचे अंग्रेज़ी में सब-टाइटल हैं। क्यों जी, हिन्दी की चंद लाइनें भी तो हो सकती थीं। या फिर चीनी ही रहने देते। आखिर इन्दी-चीनी बाई-बाईही तो हैं। गीत-संगीत अच्छा होते हुए भी दिल में नहीं उतर पाता। दिल में तो खैर, यह पूरी फिल्म ही नहीं उतर पाती। पर हां, इस तरह की कहानियां कही जानी चाहिएं। वरना वक्त की धूल हमारे इतिहास को धुंधला करती जाएगी और पता भी नहीं चलेगा।
अपनी रेटिंग-दो स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

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