Saturday, 4 August 2018

रिव्यू-हसीन पलों का ‘कारवां’

-दीपक दुआ...
अपने पिता, अपनी नौकरी और अपने-आप से नाखुश बेटे को पता चला कि उसके पिता की एक हादसे में मौत हो गई है। लेकिन पिता की जगह गई किसी औरत की बॉडी और पिता की बॉडी पहुंच गई उस औरत की बेटी के पास। अब बेटा निकला है अपने दोस्त के साथ उस औरत के शहर की तरफ। रास्ते में उस औरत की बेटी को भी उसे लेना है। कई अनुभव, कई पंगे और कई बदलाव होते हैं इस सफर में।


रोड मूवीज़यानी एक सफर पर निकले कुछ लोगों की कहानी देखते हुए लगातार यह उत्सुकता बनी रहती है कि अब क्या होगा और रास्ते में इनके साथ कैसी घटनाएं पेश आएंगी। इस फिल्म को लिखने वालों ने लगातार यह उत्सुकता बनाए रखी है। अचानक आने वाले ट्विस्ट इसे और ज़्यादा दिलचस्प और गहरा बनाते हैं। इस तरह की फिल्मों का एक तय ढर्रा यह भी होता है कि इसमें किरदार निकले तो हैं कहीं पहुंचने के लिए लेकिन अक्सर वे इस सफर में खुद को तलाश लेते हैं। इस फिल्म में भी ऐसा ही है। फोटोग्राफर बनने की ख्वाहिश रखने वाला अविनाश अपने पिता का कहा मान कर नौकरी तो कर रहा है लेकिन खुश नहीं है। उसके साथ सफर कर रही लड़की के लिए लापरवाही ही ज़िंदगी है। ये दोनों एक-दूसरे के साथ रह कर एक-दूजे को बदलते हैं और खुद को भी।

फिल्म बहुत सारे सुखद पल परोसती है। इस लड़की का एट्टियूड अनोखा है। रास्ते में होने वाला एक हादसा कहानी को एक दिलचस्प मोड़ देता है। अविनाश की पुरानी दोस्त का आना सुहाना लगता है। अंत में अविनाश का अपने पिता से जुड़ना प्यारा लगता है। लेकिन सबसे ज़्यादा असर छोड़ता है अविनाश के दोस्त शौकत का किरदार। ज़िंदादिली और हाज़िरजवाबी से भरपूर यह अनोखा इंसान इस फिल्म की रूह है। इस किरदार को बेहतरीन संवाद दिए गए हैं और इरफान खान ने इसे अपने स्टाइल में यादगार ढंग से निभाया भी है। अविनाश के रोल में मलयालम फिल्मों के स्टार अभिनेता डुलकेर सलमान (मम्मूटी के बेटे) की हिन्दी में प्रभावी शुरूआत हुई है। कट्टी बट्टीमें चुकीं मिथिला पालकर ज़बर्दस्त प्रभाव छोड़ती हैं। कृति खरबंदा और अमला का आना मिठास भरता है। बाकी सारे किरदार और उन्हें निभाने वाले सारे कलाकार भी उम्दा रहे हैं। गीत-संगीत हिट होने वाला भले हो, फिल्म के मूड के मुताबिक लगता है। खास बात इस फिल्म की लोकेशंस और फोटोग्राफी भी है। मणिरत्नम की फिल्मों की तरह इसमें दक्षिण भारत को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है। बतौर निर्देशक आकर्ष खुराना अपनी इस पहली ही फिल्म से बताते हैं कि उनकी ट्रेनिंग सही माहौल में हुई है और वह अभी काफी दूर जाएंगे।

कहीं-कहीं फिल्मी-सी होती, कभी एकदम से फनी तो कभी अचानक से पहलू बदल कर फलसफाना बन जाती इस फिल्म को उन हसीन पलों के लिए देखा जाना चाहिए जो यह पर्दे पर परोसती है।
अपनी रेटिंग-साढ़े तीन स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

1 comment:

  1. Finally ek lambe intezar ke baad koi dhang ki movie aai...
    Thank u sir

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