Friday, 20 July 2018

रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’

-दीपक दुआ...
ऊंची जात की अमीर लड़की। नीची जात का गरीब लड़का। आकर्षित हुए, पहले दोस्ती, फिर प्यार कर बैठे। घर वाले आड़े आए तो दोनों भाग गए। जिंदगी की कड़वाहट को करीब से देखा, सहा और धीरे-धीरे सब पटरी पर गया। लेकिन...!

इस कहानी में नया क्या है, सिवाय अंत में आने वाले एक जबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ भी तो नहीं। फिर इसी कहानी पर बनी मराठी की सैराटकैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कि तमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तो जरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका हिन्दी रीमेक भी बना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा कर राजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हर संवाद में - लगा देते हैं। थारो, म्हारो, आयो, जायो, थे, कथे, कोणी, तन्नै, मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार, उदयपुर जाकर देखो, लोग प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं। और हां, यह पनौतीशब्द मुंबईया है, राजस्थानी नहीं) हां, गानों के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठी फिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें) ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर जैसे मनभावन चेहरे, शानदार लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर की खूबसूरती... ये सब मिल कर इतना असर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिए लपकी चली आए।


तो जनाब, इसे कहते हैं पैकेजिंग वाली फिल्में। जब आप दो और दो चार जमा तीन सात गुणा दस बराबर सत्तर करते हैं तो आप असल में मुनाफे की कैलकुलेशन कर रहे होते हैं कि उम्दा सिनेमा बनाने की कवायद।

दो अलग-अलग हैसियतों या जातियों के लड़के-लड़की का प्यार और बीच में उनके घरवालों का जाना हमारी फिल्मों के लिए कोई नया या अनोखा विषय नहीं है। मराठी वाली सैराटके इसी विषय पर होने के बावजूद मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्म बनने के पीछे के कारणों पर अलग से और विस्तार से चर्चा करनी होगी। लेकिन ठीक वही कारण आकर उसके हिन्दी रीमेक को भी दिलों में जगह दिलवा देंगे, यह सोच ही गलत है। बतौर निर्माता करण जौहर का जोर अगर पैकेजिंग पर रहा तो उसे भी गलत नहीं कहा जा सकता। हंपटी शर्मा की दुल्हनियाऔर बद्रीनाथ की दुल्हनियाजैसी कामयाब फिल्में दे चुके शशांक खेतान की इस फिल्म को हिन्दी में लिखने और बनाने में लगी मेहनत दिखती है लेकिन जिस किस्म की मासूमियत, गहराई, संजीदगी, इमोशंस और परिपक्वता की इसमें दरकार थी, उसे ला पाने में शशांक चूके हैं-बतौर लेखक और बतौर निर्देशक भी। फिल्म के संवाद काफी साधारण हैं, एक भी ऐसा नहीं जो असर छोड़ सके। फिल्म की एडिटिंग सुस्त है।

किशोर उम्र की प्रेम-कहानियां यानी टीनऐजर लव स्टोरी अगर कायदे से बनी हों तो तो बचकानी लगने के बावजूद देखी और सराही जाती है। इस फिल्म के शुरूआती हिस्से में लड़का-लड़की का एक-दूजे की तरफ बढ़ने का हल्का-फुल्का हिस्सा प्यारा लगता है। लेकिन बाद वाले हिस्से में मामला ठस्स पड़ जाता है। नतीजे के तौर पर तो हमें नायक-नायिका से हमदर्दी होती है, उनका दर्द महसूस होता है और ही हम उनके संघर्ष के सफर के साथी बन पाते हैं। फिल्म बड़ी ही आसानी से अमीर-गरीब या ऊंच-नीच वाले विषय पर ठोस बात कह सकती थी लेकिन लगता है कि बनाने वालों ने पहले से ही किसी विवाद या गंभीर बहस में पड़ने की ठान रखी थी। 
 
ईशान अपने किरदार में फिट रहे हैं। उनके काम में दम दिखता है। हालांकि उन पर बड़े भाई शाहिद कपूर का काफी असर नजर आता है। जाह्नवी स्टार मैटीरियल हैं। अपने किरदार के मुताबिक जरूरी अकड़ और दमक दिखाने में वह कामयाब रही हैं। संवाद अदायगी में सुधार लाकर वह और चमकेंगी। इमोशनल दृश्यों में उन्हें अभी और मैच्योर होने की जरूरत है।

यह फिल्म एक खूबसूरत काया भर है-बिना दिल की, बिना धड़कन की। सैराटकी छाया से परे जाकर और उससे तुलना किए बिना देखें तो भी यह एक आम, साधारण प्रॉडक्ट ही बन पाई है। इसमें वो बात नहीं है जो आपके दिलों की धड़कनों को तेज कर सके या उन्हें थाम सके। हां, टाइम पास के लिए यह बुरी नहीं है।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

1 comment:

  1. Sir Mae Aapse Sehmat nahi hoon kyun jaha tak mujhe lagta hae Shashank jaise ek acche storyteller nae isme kuch nayapan ka masala bhale hi na bikhera ho par haan jo unki kahani ko darshane ki jo jadoo ki chadi hae unhone us ka iss film mae bahkhubi se istamaal kiya hae.

    Rahi baat kahani mae kuch nayapan ki jab hame 1 saal pehle se hi ye bataya gya hae un mahanubhavo(Director and Producer)se ki bhaiye ye sairat ka remake hae to mujhe nahi lagta ki hame iske baare mae kuch jyada sochna chahiye haan agar isme kuch kami rahi to wo hae film ka climax kyunki ek sur se kahaani chalrahi hae aur aap usme doobe ja rahe ho aur achanak se kahaani ki puri pasa ko hi palat ke dhadaak se use rokne ki jo koshish ki gai wo thodi mujhe galat lagi baaki hmne sairat mae bhi yehi dekha tha fir abhi haal filal mae aai punjabi sairaat(Channa Mereya) mae bhi wahi to phir isme kya naya dekhe wo bhi remake.

    Kulmilakar mujhe ye ek family entertainer lagi paisa wassol to nahi kehsakte haan par itna jaroor haak se kehsakte hae ki Bhaiya itne ma to itna hi milega.

    3/5 Star.

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