Friday, 23 March 2018

रिव्यू-च्च...च्च...‘हिचकी’, वाह...वाह...‘हिचकी’

-दीपक दुआ...
एक नामी स्कूल। होशियार बच्चे। काबिल टीचर। कुछ बच्चे नालायक। वे पढ़ना चाहते हैं उन्हें कोई पढ़ाना चाहता है। एक नया टीचर आता है। बाकियों से अलग। पढ़ाने का ढंग भी जुदा। नालायक बच्चे उसे भगाने की साज़िशें करते हैं। लेकिन वह डटा रहता है, टिक जाता है और उन्हीं नालायक बच्चों को होशियार बना देता है।

इस कहानी में नया क्या है? कुछ भी नहीं। जागृतिऔर परिचयसे लेकर तारे जमीन परतक में कमोबेश ऐसी कहानियां हम देखते आए हैं। मगर इस फिल्म में नया यह है कि यहां स्कूल में आई नई टीचर खुद एक अजीब-सी बीमारी या आदत से ग्रस्त है जिसे टूरैट सिंड्रोमकहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अपने शरीर की कुछ आवाज़ों और हलचलों पर नियंत्रण नहीं रहता। जैसे नैना के मुंह से अक्सर च्च... च्च... वा... वा...की आवाज़ें निकलती रहती हैं। बचपन से लेकर उसने अब तक इसकी वजह से बहुत कुछ झेला है और अब इन नालायक बच्चों को पढ़ाने की चुनौती स्वीकार करने के बाद उसे उनसे ही नहीं, अपनी इन आवाज़ों से भी जूझना है।

शुरूआत में लगता है कि यह फिल्म नैना के टूरैट सिंड्रोम से भिड़ने और जीतने की कहानी दिखाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। यह फिल्म वही पुरानी कहानी दिखाती है जिसमें किताबी तरीकों से बच्चों को पढ़ा रहे किसी अनुभवी टीचर के मुकाबले अनूठे ढंग से पढ़ाने वाले एक नए टीचर की जीत दिखा दी जाती है। जिसमें नालायक समझे जाने वाले बच्चे उस टीचर का साथ पाकर जिम्मेदारी महसूस करने लगते हैं।

यह फिल्म एक साथ कई बातें सिखाती है। किसी शारीरिक या मानसिक समस्या से ग्रस्त बच्चे के साथ उसके परिवार वालों और समाज को कैसे पेश आना चाहिए से लेकर नालायक समझे जाने वाले बच्चों के साथ उनके टीचर्स को कैसा बर्ताव करना चाहिए तक की सीखें यह देती है। लेकिन दिक्कत यही है कि इन सारी बातों में नयापन नहीं दिखता। फिर जिस तरह से हालात तेजी से बदलते हैं उससे सब कुछ फिल्मी-साभी लगने लगता है। हमें पहले ही यह आभास हो जाता है कि जो पहले नालायक हैं, बाद में वही होशियार निकलेंगे। कहानी का बेहद बारीक धागे पर टिके होना फिल्म को हल्का बनाता है। घटनाओं और चौंकाने वाले पलों का लेप लगा कर इसे और वजनी बनाया जाना चाहिए था।

वी आर फैमिलीदे चुके निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा के डायरेक्शन में काफी परिपक्वता आई है। लेकिन कमाल तो किया है इस फिल्म के तमाम कलाकारों ने। रानी मुखर्जी अद्भुत काम कर गई हैं। नीरज कबी बेहद प्रभावी रहे। सचिन और उनकी पत्नी सुप्रिया पिलगांवकर, आसिफ बसरा, शिव सुब्रह्मण्यम, कुणाल शिंदे, स्पर्श खनचंदानी, रिया शुक्ला और तमाम बच्चे उम्दा रहे। आई एम कलाममें चुके और इस फिल्म में आतिश बने हर्ष मयार में एक ज़बर्दस्त आग है। आने वाले वक्त में यह लड़का कमाल करेगा। गीत-संगीत फिल्म के मिजाज के मुताबिक है।

यह फिल्म टूरैट सिंड्रोम से ज्यादा शिक्षा व्यवस्था के बारे में बात करती है। बुरे, अच्छे, समझदार और परफैक्ट टीचर के बीच का फर्क बताती है। हां, आंखें भी नम करती है और समझाती-सिखाती भी है। पहले हिस्से में ठंडी-सूखी रह कर दूसरे हाफ में उड़ान भी भरती हैबस, चौंकाती नहीं है, कुछ नया देते-देते थम जाती है और इसी वजह से मास्टरपीस नहीं बन पाती।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

3 comments:

  1. Rani ka comeback is se behtar shayad ho sakta tha...Thank u sir...

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  2. बेहतरीन रिव्यू
    इसके साथ मेरे लिए एक सवाल यह भी रहा कि ये फ़िल्म नई-पुरानी शिक्षा-पद्धति को दर्शाती है या दो सेक्शन की लड़ाई? बाकी कहानी अलग-अलग हिस्सों और तरीकों से मैंने कई फिल्मों में देखी है पर इस पिक्चर में सेक्शन बनाने और उसमें विद्यार्थियों को भरने का आधार भी स्पष्ट कर दिया वो एक नयापन था।

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  3. बिल्कुल सही कहा आपने... फिल्म में वर्ग-संघर्ष भी है जिसकी ओर ज़्यादातर लोगों का ध्यान गया ही नहीं... शुक्रिया...

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