Saturday, 30 September 2017

मोहित मदान को हैं ‘अक्सर 2’ से उम्मीदें


-दीपक दुआ...
मोहित मदान जन्मे तो दिल्ली में लेकिन पले-बढ़े न्यूजीलैंड में। एक्टिंग का शौक उन्हें मुंबई खींच लाया जहां ढेरों विज्ञापनों के अलावा एक फिल्म लव एक्सटेंशनमें भी उन्होंने काम किया। अब वह 6 अक्टूबर को रिलीज़ हो रही निर्देशक अनंत महादेवन की फिल्म अक्सर 2’ में आ रहे हैं। उनसे हुई एक बातचीत-
       
-न्यूजीलैंड से मुंबई, सिर्फ एक्टिंग के लिए?
-जी। दरअसल मेरे मन में शुरू से ही था कि मुझे एक्टिंग ही करनी है तो जब कैरियर चुनने का सवाल मेरे सामने आया तो मैंने वही किया जो मैं चाहता था। देखिए, जोखिम तो हर काम में है। मैं कम से कम वह तो कर रहा हूं जो मैं चाहता था।
-लेकिन बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने के लिए हिम्मत कहां से आई?
-हिम्मत आई मेरे खुद के आत्मविश्वास से। मुझे अपनी काबिलियत पर भरोसा था कि मैं जो भी करूंगा, पूरी तरह से डूब कर करूंगा। इसी हिम्मत के दम पर ही मैं यहां पर टिका हुआ हूं।
-‘अक्सर 2’ के बारे में बताएं?
-इसे अक्सरकी ही तरह अनंत महादेवन ने डायरेक्ट किया है लेकिन यह उस फिल्म का सीक्वेल नहीं है। यह एक सस्पेंस थ्रिलर है जिसमें मेरे किरदार का नाम बच्चन सिंह है। यह एक ग्रे-शेड वाला रोल है और मुझे पूरा यकीन है कि जब यह फिल्म आएगी तो लोगों को न सिर्फ फिल्म अच्छी लगेगी बल्कि मेरा काम भी बहुत पसंद आएगा और इसके बाद लोग मुझे अच्छी तरह से पहचानने भी लगेंगे।
-इसके अलावा और कोई फिल्म भी कर रहे हैं?
-एक और फिल्म है इश्क तेरा। यह भी पूरी हो चुकी है और कभी भी आ सकती है।

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)


Friday, 29 September 2017

रिव्यू-‘जुड़वा 2’-देख लीजिए नौ से बारह...


-दीपक दुआ...
1997 में आई सलमान खान वाली जुड़वा’ (ज़्यादातर लोग इस शब्द को जुड़वांबोलते हैं) की कहानी सब जानते हैं। एक परिवार में जन्मे दो जुड़वा लड़के पैदा होते ही विलेन की कारस्तानी से बिछड़ गए। एक स्ट्रीट स्मार्ट बना तो दूसरा सोफिस्टिकेटिड। पास-पास होते तो जो हरकत एक करता, दूसरे के साथ भी वैसा ही होने लगता। बड़े हुए तो इनकी जिंदगी में लड़कियां भी आईं और विलेन भी। नाचते-गाते, चूमते-चाटते, मारते-पीटते इन्होंने हमारा जम कर मनोरंजन किया था।

जुड़वा’ 1994 में आई नागार्जुन वाली तेलुगू फिल्म हैलो ब्रदरका रीमेक थी। यह अलग बात है कि हैलो ब्रदर’ 1992 में आई जैकी चान की फिल्म ट्विन ड्रैगन्सकी कॉपी थी। खैर, ‘जुड़वाके डायरेक्टर डेविड धवन अपनी उसी फिल्म की कहानी पर जुड़वा 2’ लेकर आए हैं जिसमें नएपन के नाम पर आज के चमकते, चॉकलेटी चेहरे हैं, आपको हंसाने के लिए हिट फिल्मों के रेफरेंस से गढ़े गए सीन और संवाद हैं, लंदन की दिलकश लोकेशन है। बाकी, वे तमाम मसाले तो हैं ही जिन्हें अपनी फिल्मों में छिड़क कर डेविड धवन दर्शकों को ऐसा मनोरंजन परोसते आए हैं जो आपको तमाम फिक्र-चिंताएं भुला कर ढाई घंटे तक एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।

ऐसी फिल्मों में स्क्रिप्ट और स्पीड पर ही खासा जोर रहता है। इस फिल्म में यूनुस सजावल की स्क्रिप्ट ने इंटरवल तक तो जम कर मोर्चा बांधे रखा लेकिन उसके बाद यह कहीं-कहीं ढीली और अतार्किक हुई तो साजिद-फरहद के संवादों ने उसे संभाल लिया। फिर डेविड ने रफ्तार कहीं कम नहीं होने दी और बचा-खुचा काम एडिटर ने संभाल लिया।

वरुण धवन ऐसी भूमिकाओं में जंचते आए हैं। पापा डेविड के ही साथ वह मैं तेरा हीरोजैसी मस्त फिल्म दे चुके हैं और इस बार भी उन्होंने वैसी ही रंगत बिखेरी है। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि सलमान खान की गुड लुक्स और उनके छिछोरे किरदारों वाली इमेज को मौजूदा पीढ़ी के हीरोज़ में वरुण ही बेहतर संभाल सकते हैं और संभाल भी रहे हैं। ऐसी फिल्मों में हीरोइनों का मुख्य काम हीरो के साथ डांस-रोमांस करते हुए छोटे कपड़े पहन कर दर्शकों की आंखों को गर्माने का चांस देना होता है और तापसी पन्नू जैक्लिन फर्नांडीज़ ने यह जिम्मा बखूबी निभाया है। सहयोगी भूमिकाओं में आए तमाम कलाकार भी उम्दा सहयोग दे गए। गाने फिल्म के मिजाज के मुताबिक चटपटे-मसालेदार हैं। हां, सलमान की एंट्री निराशाजनक रही।

इस किस्म की फिल्मों को देखते हुए दिमाग के तंतुओं को ज़ोर नहीं लगाना पड़ता। दिमाग को आराम देना हो, बेदिमाग चीजों को देख कर मिरगी आती हो और मसालेदार मनोरंजन से परहेज हो तो इसे देखने चले जाइए तीन से छह, छह से नौ या फिर नौ से बारह...!

अपनी रेटिंग-तीन स्टार

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)
 

Saturday, 23 September 2017

जयपुर की अनोखी ‘सुर-संगत’


-दीपक दुआ...
वे सचमुच अनोखे लोग हैं। हर सुबह संगीत की सुर-लहरियों से उनका दिन शुरू होता है और देर रात तक वे संगीत की ही लहरों में डूबते-उतराते रहते हैं। इन लोगों में लेखक, पत्रकार, प्रकाशक, कलाकार, डॉक्टर, वकील, जज, अध्यापक, फिल्मकार, व्यापारी, दुकानदार, इंजीनियर जैसे तमाम पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं। लेकिन इन सबके बीच कोई एक चीज कॉमन है तो वह है संगीत। और संगीत में भी हिन्दी फिल्मों के सुनहरे दौर के संगीत से इन्हें खासा लगाव है। संगीत के प्रति इन संगीत-रसिकों की दीवानगी यह है कि अपनी संगत को इन्होंने नाम दिया है-सुर संगत।

जयपुर से संचालित इस समूह के व्हाट्सऐप पर बने ग्रुप में सुबह से ही उस दिन से जुड़ी फिल्मी हस्तियों के जन्मदिन या पुण्यतिथि के जिक्र के बाद उनसे जुड़े गीतों, संवादों, जानकारियों को डालने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस संगत के सदस्यों के पास दुलर्भ गीत, रिकॉर्डिंग, फिल्में मौजूद हैं जिन्हें ये एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर लोग उम्र के उस पड़ाव पर हैं जब लोग-बाग आरामतलब होकर खुद को रिटायर मानने लगते हैं लेकिन इन सबकी सक्रियता देख हैरानी होती है और इस बात पर यकीन भी कि संगीत से प्यार हो तो जिंदगी कितनी खुशगवार हो जाती है।

एक खास बात यह भी कि पिछले कई साल से इस ग्रुप के लोग हर महीने के दूसरे रविवार को तीन-चार घंटे के लिए एक जगह मिलते हैं और किसी एक विषय पर फिल्मी गीत देखने-दिखाने, गाने-सुनने के अलावा उस पर चर्चा विचारों का आदान-प्रदान भी करते हैं। पहले इनकी यह सुर-संगतकहीं भी जम जाया करती थी लेकिन अब जयपुर स्थित राजस्थान प्रौढ़ शिक्षा समिति ने इन्हें अपने यहां यह संगत जमाने की जगह देने के साथ-साथ दोपहर का भोजन कराने का जिम्मा भी ले लिया है। ऐसी ही एक संगत में मुझे हाल ही में शरीक होने का मौका मिला। जयपुर शहर में कर्फ़्यू लगा होने के बावजूद ये लोग उस दिन अपने शहर से मुंबई गए रूमानी गीतकार हसरत जयपुरी को उनकी पुण्यतिथि पर याद करने के लिए इक्ट्ठा हुए और हसरत साहब के ऐसे-ऐसे गीत, ऐसी-ऐसी बातें निकल कर आईं कि अजब समां बंध गया।

संगीत में ताकत है, संगीत में उत्साह है, संगीत में पवित्रता है। लेकिन संगीत में यूं सबको एक साथ बांधे रखने की क्षमता भी है, यह जयपुर की इस अनोखी सुर-संगतको देख कर ही मैंने जाना।

 


(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)