Saturday, 27 May 2017

रिव्यू-तसमे कसने को प्रेरित करती ‘सचिन ए बिलियन ड्रीम्स’


-दीपक दुआ...

एक ऐसा देश जहां क्रिकेट को धर्म माना जाता हो और सचिन तेंदुलकर को भगवान, वहां के लोगों को भला अपने इस भगवान के बारे में क्या कुछ नहीं पता होगा? तो ऐसे में यह फिल्म भला क्या नया और अनोखा दे सकती है?

तो पहले यही बता दिया जाए कि यह कोई फिल्म नहीं है बल्कि आप इसे सीधे-सीधे सचिन पर बनी एक ऐसी डाॅक्यूमैंट्री कह सकते हैं जो उनकी जीवनी होने का अहसास भी कराती है। सचिन से जुड़े तथ्यों की बात करें तो इसमें सचमुच कुछ नया नहीं है लेकिन सचिन के सचिन बनने और सचिन बने रहने के सफर में उनकी और उनके परिवार, दोस्तों आदि की सोच और कोशिशों का जो चिट्ठा यह फिल्म पेश करती है वह अद्भुत है। थोड़ा और आगे बढ़ कर कहूं तो यह फिल्म पर्दे पर उतरा एक ऐसा दस्तावेज है जिसे हर उस शख्स को देखना चाहिए जो सचिन को पसंद करता है और हर उस शख्स को भी जिसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सचिन तेंदुलकर कौन है।

फिल्म चूंकि सचिन को बतौर नायक दिखाती है तो जाहिर है इसमें वही बातें ज्यादा हैं जो उन्हें नायक बनाती हैं। लेकिन सचिन के बचपन की शरारतों से लेकर उनके संघर्ष, उनकी सोच, उनके जज्बे के अलावा यह उनके करीबियों की उनके प्रति सोच को भी दिखाती चलती है। क्रिकेट के प्रति सचिन के समर्पण के अलावा उनके पिता की उन्हें दी गईं सीखें, खुद उनका अपने पिता जैसे इंसान बनने का इरादा जैसी बातें हमें उस सचिन से मिलवाती हैं जो अंदर से बेहद कोमल है और जिसका यह पहलू जनता के सामने ज्यादा नहीं आया है।

एक डाॅक्यूमैंट्री होने के बावजूद रोचकता से भरपूर यह फिल्म जिस तरह से सचिन की जिंदगी में झांकती है, वह अनोखापन इसे बनाने वालों की काबिलियत दर्शाता है। हालांकि फिल्म में उनके बाल सखा विनोद कांबली, उस दौर के क्रिकेट के महानायक कपिल देव, उन्हें बेहद सराहने वाली लता मंगेशकर जैसी हस्तियों की कमी खलती है और साथ ही कुछ जगह यह नीरस भी होती है लेकिन अपने सपनों को पाने के लिए अपने तसमों को कसने की जो गाथा यह दिखाती है, वह सचमुच प्रेरणादायक है। आप इसे देखिए या देखिए, अपने बड़े होते बच्चों को जरूर दिखाइए। और हां, रूमाल लेकर जाइएगा, मुझ जैसे नाॅन-क्रिकेटिये की आंखें नम हो गईं तो आप तो सचिन को भगवान मानते हांेगे।

अपनी रेटिंग-4 स्टार

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