Friday, 25 November 2016

रिव्यू-पड़िए ‘मोह माया’ में, बचाइए मनी


-दीपक दुआ...
एक महानगर। जल्दी-जल्दी बहुत कुछ हासिल कर लेने की दौड़ में आपसी रिश्तों की उष्मा भूलते लोग। लंबा हाथ मारने के चक्कर में हुई एक गलती को छुपाने की खातिर गलतियों पर गलतियां। अंत सब को पता ही है-बुरे काम का बुरा नतीजा।

फिल्मों के अलावा टी.वी. के क्राइम पैट्रोलया सनसनीकिस्म के प्रोग्रामों के हर दूसरे एपिसोड में यही तो कहानी होती है। रोज़ाना सुबह अखबारों की सुर्खियों में भी ऐसी दो-एक कहानियां मिल ही जाती हैं। तो, इस फिल्म में नया क्या है? जवाब है-कुछ नहीं।

एक बहुत ही सामान्य कहानी पर बुनी गई यह फिल्म महानगरों में अकेले रह रहे जोड़ों की जिंदगी की रोजमर्रा की भागदौड़, उनके ऊंचे सपनों, उन सपनों को सच करने की कोशिश में पीछे छूटते अपनों, किसी मकसद को पूरा करने के लिए बनते नए रिश्तों और ठंडे पड़ते करीबी संबंधों को विस्तार से दिखाती है। लेकिन इसे बेवजह जटिल भी बनाया गया है। जिस किस्म की समझदारी इस तरह की स्क्रिप्ट में चाहिए होती है, वह इसमें कम दिखाई देती है। यही कारण है कि सिर्फ एक घंटे 50 मिनट की इसकी लंबाई भी खिंचती-सी मालूम होती है। इसकी कहानी में आगे आने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान दर्शक को बांध कर रख पाने में विफल रहता है।

निर्देशक मुनीष भारद्वाज दिल्ली शहर के मिजाज को भी इस कहानी का हिस्सा बना पाने में कामयाब रहे हैं। रणवीर शौरी बहुत ही आसानी से अपने किरदार को आगे ले जाते हैं। मिडल क्लास से छुटकारा पाने की तड़प, इसके लिए हर गलत काम को सहजता से करते जाने और दुख, पछतावे, गुस्से, बेबसी जैसे भावों का वह बेहतरीन ढंग से इजहार कर पाते हैं। नेहा धूपिया भी अपने किरदार में जंची हैं लेकिन रणवीर के सामने वह फीकी पड़ जाती हैं। छोटे-से रोल में आईं विदुषी मेहरा प्रभावित करती हैं। फिल्म में कोई गाना नहीं है।

इस तरह की कहानी अगर रोचक तरीके से बनाई जाए तो वह बड़े पर्दे के लायक नहीं रहती। इसी में अगर थ्रिल, एक्शन और कॉमेडी के क्षण होते तो यह ज्यादा पकड़ बना पाती। फिलहाल तो यह टी.वी. के किसी क्राइम शो का एपिसोड सरीखी लग रही है जिसके लिए थिएटर तक जाने की जरूरत महसूस करते हों तो जाइए, वरना मोह-माया में पड़ कर अपनी मनी बचाइए।

अपनी रेटिंग-2 स्टार

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