Friday, 30 September 2016

रिव्यू-क्यों देखने लायक है धोनी की यह कहानी...?



-दीपक दुआ...

सिनेमा और क्रिकेट-इस देश के लोगों में इन दोनों के ही प्रति जबर्दस्त दीवानगी है। ऐसे में अगर भारतीय क्रिकेट के स्टार खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी की जिंदगी पर कोई फिल्म बन कर आए तो लोगों में उसके प्रति हद दर्जे की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। इस फिल्म को देखते हुए यह उत्सुकता भले ही पूरी तरह से शांत न होती हो, मगर यह फिल्म धोनी से जुड़ी हर वह चीज आपको परोसने की कोशिश करती है, जो जरूरी है। यह बात अलग है कि यह बड़ी ही चतुराई से कई चीज़ें छुपा भी जाती है।

पान सिंह धोनी के घर में एक बेटे के पैदा होने से लेकर उसके एक नामी क्रिकेटर बनने और वनडे इंटरनेशनल में वर्ल्ड कप जीतने तक के इस सफर में ज्यादातर बातें वही हैं जो धोनी के दीवानों को पता होंगी। लेकिन फिल्म डाॅक्यूमैंट्री या जीवनी न होने का दावा करती हुई भी उन तमाम बातों को सिलेसिलेवार दिखाती है।

शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि पर्दे पर किसी हिन्दी फिल्म के दो नाम एम एस धोनी-द अनटोल्ड स्टोरीऔर एम एस धोनी-एक अनकही कहानीदिखाई देते हैं। दूसरे वाले नाम से सस्पैंस या हॉरर की महक आती है, मुमकिन है इसीलिए पहले वाला नाम रखा गया हो। लेकिन यहीं गड़बड़ हुई है। धोनी के प्रसंशक पूछ सकते हैं कि इसमें अनटोल्डया अनकहाक्या था? मगर यह फिल्म इसका जवाब देती है और भरपूर देती है।

किसी भी खिलाड़ी के महान बनने के पीछे, घर-घर और दिल-दिल में राज करने के पीछे उसका खुद का एक लंबा और तकलीफ भरा संघर्ष तो रहता ही है, उसके घरवालों, दोस्तों, करीबियों की भी उसमें महती भूमिका रहती है और यह फिल्म उनकी इस भूमिका को न सिर्फ कायदे से समझती और समझाती है बल्कि बताती है कि कोई भी सिर्फ खुद के दम पर महान नहीं हो सकता। धोनी के मामले में उसके पिता का उसके सुरक्षित भविष्य को लेकर लगातार चिंतित रहना, उसकी बहन, उसके दोस्तों, साथी खिलाड़ियों, कोच, उसे रेलवे में नौकरी देने वाले अफसर, उसके सहकर्मी जैसे ढेरों किरदारों की सोच और नीयत के बारे में खुल कर दिखाती है यह फिल्म।

निर्देशक नीरज पांडेय किरदारों के मन में झांकते हुए सीन-दर-सीन कहानी बुनने का हुनर बखूबी जानते हैं। सुशांत सिंह राजपूत ने धोनी के किरदार को न सिर्फ निभाया है, बल्कि जिया है। अपनी हर अदा से वह इस किरदार को सशक्त बनाते हुए नजर आते हैं। अनुपम खेर, राजेश शर्मा, कुमुद मिश्रा जैसे कलाकार उन्हें भरपूर सहयोग देते हैं। दोनों नायिकाओं की मौजूदगी प्यारी लगती है। भूमिका चावला को बहन-भाभी के ऐसे किरदारों को करते रहना चाहिए। गीत-संगीत काफी साधारण है। चंद जोरदार गाने होते तो यह फिल्म और गहरा असर छोड़ती। हां, बैकग्राउंड म्यूजिक असरदार है और वह फिल्म को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद करता है। लोकेशंस भी स्क्रिप्ट की जरूरत के मुताबिक चुनी गईं और रांची क्षेत्र की भाषा भी।

लेकिन यह फिल्म कमियों से भी अछूती नहीं है। इसे देखते हुए साफ लगता है कि इसे धोनी के प्रचार और उनके सिर्फ उजले पक्ष को दिखाने के लिए ही बनाया गया है। उनका शांत स्वभाव, कम बोलना, विनम्रता, मोटर-साइकिलों के प्रति दीवानगी जैसे ढेरों पहलुओं को दिखाने के फेर में यह 3 घंटे 10 मिनट की हो गई जो सचमुच बहुत ज्यादा हैं। स्क्रिप्ट में कुछ एक झोल और थोड़ी-बहुत लड़खड़ाहट के अलावा कुछ चीजों का जबरन ठूंसा जाना भी इसे हल्का बनाता है।


फिर भी यह फिल्म बहुत कुछ देती है। क्रिकेट और धोनी के चाहने वालों के अलावा क्रिकेट से दूर रहने वाले मुझ जैसे आम दर्शकों के लिए भी इसमें बहुत कुछ है। खासतौर से यह मैसेज कि मेहनत और किस्मत के अलावा एक और भी चीज है जो आपको आपकी मंजिल तक ले जाती है और वह है सही समय पर लिया गया सही फैसला।

माही को अगर मैदान जीतने आते हैं तो उन पर बनी यह फिल्म भी बॉक्स-ऑफिस जीतने जा रही है। इसे मिस मत कीजिएगा। वैसे भी पूरे परिवार के साथ बैठ कर देखा जाने वाला सिनेमा अब अपने यहां कम ही बनता है।

अपनी रेटिंग-चार स्टार


Friday, 23 September 2016

रिव्यू-इस ‘बेंजो’ से न दिल झूमा न पांव थिरके



-दीपक दुआ...

बेंजों एक ऐसा साज़ है जो बजता है तो दिल के तार छेड़ देता है। फिल्म बताती है कि मुंबई में ऐसी कई बेंजो पार्टियां हैं जो गणपति और नवरात्रि के दिनों में होने वाले जलसों में लोगों को झुमाती-थिरकाती हैं। ऐसे ही एक बेंजो ग्रुप की तलाश में अमेरिका से आई एक लड़की क्रिस झोंपड़पट्टी में रहने वाले इन लोगों को कैसे नाम, पहचान और शोहरत दिलाती है, यही इस फिल्म की कहानी है।
 
यह फिल्म इसलिए भी उत्सुकता जगाती है क्योंकि यह उन रवि जाधव की हिन्दी में निर्देशित पहली फिल्म है जो मराठी सिनेमा में अपनी एक अलग हैसियत रखते हैं और राष्ट्रीय पुरस्कार तक पा चुके हैं। शायद इसीलिए यह फिल्म ज्यादा निराश भी करती है क्योंकि जब आप लगातार अच्छा काम करते रहे किसी शख्स से उम्मीदें लगाएं और वह उन उम्मीदों को तोड़े तो दर्द भी ज्यादा होता है।

अपने मिजाज से यह फिल्म रेमो की .बी.सी.डी.-एनी बडी कैन डांसके करीब लगती है। उसी की तरह यहां भी बस्ती में रहने वाले कुछ युवा हैं जिनके सपने ऊंचे हैं। लेकिन यह फिल्म इन युवाओं के संघर्ष को नहीं दिखाती। अपने सपनों को सच करने की उनकी कोशिशों को सामने नहीं लाती। ही इन लोगों के अंदर संगीत के लिए कोई जुनून है। क्रिस से प्रेरित होकर ये लोग खुद को बदलते हैं लेकिन वह बदलाव रस्मी-सा लगता है। इनका एक विरोधी बेंजो प्लेयर तो रातोंरात गुंडे से यूं शरीफ बन जाता है जैसे उसका दूसरा जन्म हुआ हो। फिर इस कहानी में और भी ढेरों ऐसी चीजें ठूंसी गई हैं कि यह इधर की रहती है उधर की। जाहिर है कि इसे लिखने-बनाने वालों को खुद पर यह भरोसा ही नहीं था कि वे एक खालिस म्यूजिकल फिल्म बना कर कामयाबी हासिल कर पाएंगे। इस चक्कर में अच्छी-भली फिल्म का झोलझाल बना कर रख दिया इन लोगों ने।

रितेश देशमुख और उनके साथ अपने किरदारों में जंचे। लेकिन नरगिस फाखरी में वह बात ही नजर नहीं आई जो संगीत बनाने वाली एक ऐसी जुनूनी लड़की में होती है। फिल्म की लोकेशंस, सैट्स और कैमरागिरी जरूर बढ़िया है।

एक म्यूजिकल फिल्म का म्यूजिक ऐसा होना चाहिए जो छिड़े तो सुनने वाले को छेड़ कर रख दे। विशाल-शेखर ने कोशिश तो सराहनीय की मगर एक ही गाना ऐसा बना पाए। फिल्म के अंत में जब नायक अपने ग्रुप के साथ पर्दे पर सब लोगों को थिरका रहा होता है, वह थिरकन पर्दे से उतर कर दिलों तक नहीं पहुंच पाती। टुकड़ों-टुकड़ों में यह फिल्म हंसाती, थिरकाती है मगर ये टुकड़े कम हैं और दूर-दूर भी।

अपनी रेटिंग-दो स्टार